शताब्दियों पुराने पन्नों से खुला कैलाश मानसरोवर का वो अलौकिक रहस्य जिसने देवताओं को भी कर दिया था विस्मित
धारचूला
सनातन संस्कृति और हिमालय की कंदराओं में न जाने कितने ऐसे रहस्य छिपे हैं, जो आज भी मानव बुद्धि को चमत्कृत कर देते हैं। स्कन्दपुराण के अंतर्गत मानसखण्ड के दसवें अध्याय में निहित मान्धाता चरित की कथा एक ऐसी ही विस्मयकारी और रोमांचक गाथा को उजागर करती हैं। यह कहानी केवल एक राजा की नहीं, बल्कि पृथ्वी के साक्षात स्त्री रूप में प्रकट होने और देवाधिदेव महादेव की अद्भुत लीला से जुड़ी है, जिसने अंततः पवित्र मानसरोवर को जन्म दिया।
गाथा की शुरुआत एक गहरे सस्पेंस के साथ होती है जब महर्षि धन्वन्तरि आदि गुरु दत्तात्रेय से पूछते हैं कि इस दुर्गम और अलंघ्य हिमालय का परिचय सबसे पहले इस भू-मण्डल पर किसने कराया? इसके उत्तर में जो सत्य सामने आता है, वह किसी को भी हैरत में डाल देने के लिए पर्याप्त है। सूर्यवंश के प्रतापी और एकाग्रचित्त राजा मान्धाता, जो अपनी सत्यवादिता और प्रजापालन के लिए विख्यात थे, एक रात यज्ञ से विरत होकर विश्राम कर रहे थे। तभी आधी रात के घने सन्नाटे में साक्षात पृथ्वी एक अत्यंत रूपवती स्त्री का रूप धारण कर उनके सम्मुख प्रकट हो जाती है। वह सुन्दरी राजा के अप्रतिम सौंदर्य और धर्मपरायणता पर आसक्त होकर उन्हें अपना पति बनाने की हठ कर बैठती है।
यहीं से इस पौराणिक वृत्तांत में एक अद्भुत मोड़ आता है। राजा मान्धाता अपने एकपत्नीव्रत के धर्म पर अडिग रहते हैं और उस अलौकिक सुन्दरी के प्रस्ताव को ठुकरा देते हैं। वह समझाते हैं कि मानव मरणशील है और पृथ्वी अजर-अमर है, इसलिए यह मिलन संभव नहीं है। परंतु जब पृथ्वी अनिष्ट की चेतावनी देती है, तो राजा शिव के चरणों की सौगंध पर उसे अपनी सहचरी स्वीकार कर लेते हैं। दोनों लंबे समय तक वनों और कुंजों में विचरण करते हैं। रोमांच तब और बढ़ जाता है जब वृद्धावस्था आने पर राजा वन में कठिन तपस्या का विचार करते हैं। इस पर पृथ्वी अचानक अट्टहास कर उठती है। राजा को लगता है कि वह उनके बुढ़ापे का उपहास उड़ा रही है। क्रोध के आवेश में आकर राजा अपनी तलवार खींच लेते हैं और पृथ्वी को मारने के लिए उद्यत हो जाते हैं।
प्राणों के संकट को देख स्त्री रूपी पृथ्वी भयभीत होकर सीधे हिमालय की ओर भागती है। राजा मान्धाता भी हाथ में नंगी तलवार लिए उसके पीछे-पीछे दौड़ते हैं। भागते-भागते पृथ्वी मानस-क्षेत्र में पहुँचकर अचानक जमीन के भीतर समा जाती है। राजा जब यह देखते हैं कि पृथ्वी गुप्त हो गई है, तो वे अपने दिव्य धनुष-बाण से उस पूरे क्षेत्र को खोदना शुरू कर देते हैं। इसी खुदाई के दौरान अचानक धरती के गर्भ से एक अद्भुत और जाज्वल्यमान स्वर्णहंस के समान शिवलिंग प्रकट होता है। साक्षात महादेव के इस स्वरूप को देखकर प्रतापी राजा मान्धाता का क्रोध शांत हो जाता है और वे ध्यानस्थ होकर शिव की आराधना में लीन हो जाते हैं।
इसके बाद राजा मान्धाता अपने बाणों के प्रहार से उस विशाल क्षेत्र को एक विशाल जलस्रोत में बदल देते हैं, जिसे सौ योजन लंबा और दस योजन गहरा बनाया जाता है। गंगा की पवित्र धाराओं से भरे इसी अलौकिक जलक्षेत्र को आज दुनिया मानसरोवर के नाम से जानती है। इस दुर्लभ ग्रंथ के पन्नों में यह भी दर्ज है कि कैसे राजा के इस महान कार्य को देखकर आकाशवाणी हुई थी और ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने स्वयं प्रकट होकर राजा को आशीर्वाद दिया था। मानसखण्ड के ये पृष्ठ न केवल उत्तराखंड और हिमालय की पवित्र भौगोलिक उत्पत्ति को प्रमाणित करते हैं, बल्कि सदियों पुराने उस रहस्य से भी पर्दा उठाते हैं कि कैसे एक राजा के क्रोध और अटूट शिवभक्ति ने संसार को पवित्र कैलाश क्षेत्र में सबसे पावन मानसरोवर भेंट किया।
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