रहस्यमयी स्मृतियों के झरोखे से: लालकुआं की वह पावन धरा जहाँ आज भी जीवंत हैं नीम करौली महाराज और माँ अवन्तिका की अलौकिक गाथा
आज की आधुनिक चकाचौंध, गाड़ियों के शोर और व्यस्त बाज़ारों से दूर, लालकुआं की धरा पर दशकों पहले एक ऐसा आध्यात्मिक ताना-बाना बुना गया था, जिसकी अनुगूंज आज भी यहाँ के कण-कण में महसूस की जा सकती है। यह वृत्तांत है कैंची धाम के अलौकिक संत बाबा नीम करौली महाराज की दिव्य उपस्थिति, माँ अवन्तिका देवी के पुरातन शक्ति स्थल और उनके एक परम प्रिय, निष्ठावान शिष्य स्वर्गीय मदन नारायण पंत के अटूट संबंधों का, जो आज भी नई पीढ़ी के लिए कौतूहल, विस्मय और अगाध प्रेरणा का केंद्र बना हुआ है।
दशकों पूर्व का लालकुआं आज की तरह विकसित नहीं था। चारों ओर घने, अभेद्य जंगलों का साम्राज्य था, जहाँ सूरज की किरणें भी बमुश्किल ज़मीन को छू पाती थीं। इसी बीहड़ और निर्जन वन के बीच स्थित था माँ अवन्तिका देवी का एक अत्यंत प्राचीन, छोटे पत्थरों से निर्मित मंदिर। सामान्य जनमानस के लिए उस समय उस घने जंगल में अकेले जाना मुमकिन नहीं था। लेकिन, इस निर्जनता के पीछे एक महा-रहस्य छिपा था। उसी दौर में, जब भी अलौकिक शक्तियों के स्वामी बाबा नीम करौली महाराज एम्बेसेडर कार से लालकुआं क्षेत्र से होकर गुजरते थे, तो इस घने वन के बीच स्थित प्राचीन मंदिर परिसर में उनका पड़ाव अवश्य होता था। बाबा वहाँ अपनी कार रुकवाते, वन के सन्नाटे के बीच माँ अवन्तिका के दरबार में बैठते, विश्राम करते और घंटों गहरे ध्यान में लीन हो जाते थे। सिद्ध संत का इस एकांत शक्तिपीठ पर आकर बैठना, आने वाले एक स्वर्णिम युग का गुप्त संकेत था।
इस आध्यात्मिक गाथा का सबसे दिलचस्प और जादुई पहलू स्थानीय पेट्रोल पंप से शुरू होता है। मूल रूप से जनपद पिथौरागढ़ के सुदूर पभ्या गाँव के निवासी और लालकुआं में एक प्रकांड विद्वान के रूप में सम्मानित, उच्च कुलीन ब्राह्मण स्वर्गीय मदन नारायण पंत का आवास उस पेट्रोल पंप के पास ही था जहाँ बाबा की एम्बेसेडर कार में ईंधन भरा जाता था। बाबा के प्रति पंत जी की निष्ठा और समर्पण ऐसा था कि जैसे ही बाबा की गाड़ी रुकती, वे अपने सारे सांसारिक और व्यावसायिक कार्यों को छोड़कर पूरी तरह बाबा की सेवा में रम जाते थे। घंटों तक बाबा और पंत जी के बीच गंभीर धर्मचर्चा और आध्यात्मिक संवाद चलता था। यह समीपता केवल भौतिक सेवा तक सीमित नहीं थी, बल्कि यह दो उच्च आत्माओं का वह मिलन था जिसने लालकुआं की सांस्कृतिक दिशा को सदैव के लिए बदल दिया। मदन नारायण पंत जी के इस निश्छल व्यवहार और सेवा भावना के कारण स्वयं महाराज जी उन पर विशेष स्नेह और कृपा बरसाते थे।
स्वर्गीय मदन नारायण पंत जी न केवल बाबा नीम करौली महाराज के प्रिय सहयोगी थे, बल्कि माँ भगवती के भी परम उपासक थे। उनके जीवन में एक रहस्यमयी मोड़ तब आया, जब वर्षों पूर्व माँ भगवती ने स्वयं उन्हें स्वप्न में दर्शन दिए। उस समय जब लालकुआं पूरी तरह अविकसित था, माँ ने स्वप्न में प्रकट होकर पंत जी को उसी निर्जन स्थान पर भव्य शक्तिपीठ स्थापित करने का एक दिव्य आदेश दिया। पंत जी ने इसे महज़ एक साधारण स्वप्न या कल्पना नहीं माना, बल्कि इसे साक्षात ईश्वरीय आदेश स्वीकार कर अपने जीवन का एकमात्र उद्देश्य बना लिया। इस पुनीत कार्य में उन्हें स्थानीय भक्तों और प्रसिद्ध सहयोगी स्वर्गीय योगेश गोयल का साथ मिला। पंत जी की अगुवाई में माँ अवन्तिका के पुराने पत्थर निर्मित मंदिर का प्रारंभिक जीर्णोद्धार और नव-निर्माण कार्य आरंभ हुआ। इस पुनरुत्थान के दौरान स्वयं बाबा नीम करौली महाराज कई बार मंदिर प्रांगण में पधारे। उन्होंने वहाँ मदन नारायण पंत तथा अन्य भक्तों के साथ बैठकर माँ अवन्तिका की महिमा का गान किया और उपस्थित जनों को आशीर्वाद दिया। वह छोटा सा पत्थरों का ढांचा आज एक भव्य, रमणीय और विशाल आस्था के केंद्र के रूप में स्थापित हो चुका है।
मदन नारायण पंत जी के ७८ वर्षीय पुत्र सुमित्रानंदन पंत आज भी उन अलौकिक पलों को याद कर भावुक हो उठते हैं। वे बताते हैं कि बचपन में उन्होंने और उनके भाई ने अपने पिता की अगाध श्रद्धा को बेहद करीब से देखा था। जब भी महाराज जी लालकुआं पधारते, उनके पैतृक आवास पर उनका आना-जाना अवश्य होता। बाबा घर पर आते, धार्मिक चर्चा करते और फिर मंदिर परिसर में जाकर ध्यानमग्न हो जाते। सुमित्रानंदन पंत बताते हैं कि महाराज जी के सानिध्य में बिताए गए वे पावन क्षण, माँ अवन्तिका मंदिर की धार्मिक गतिविधियाँ, कैंची धाम का दिव्य वातावरण और भक्तों की चहल-पहल उनके अंतःकरण में आज भी उतनी ही ताज़ा हैं, मानो यह सब कल ही घटित हुआ हो। जब भी बाबा आते, उनके पिता सारे काम छोड़कर बाबा की सेवा में लग जाते
इस पूरे प्रसंग और ऐतिहासिक धरोहर को जीवंत रखने तथा इसे जन-जन तक पहुँचाने में स्थानीय प्रबुद्ध जनों का बहुत बड़ा योगदान है। लालकुआं के पूर्व नगर पंचायत अध्यक्ष कैलाश चंद्र पंत ने अपने बचपन की अनमोल स्मृतियों को याद करते हुए इस पावन इतिहास की पुष्टि की है। उन्होंने बाबा के प्रति अगाध श्रद्धा व्यक्त करते हुए साझा किया कि बाबा नीम करौली महाराज की दिव्य छवि आज भी हमारी यादों में पूरी तरह सजीव है। उनका पावन सान्निध्य और उनकी असीम करुणा को लालकुआं की आत्मा में आज भी गहराई से महसूस किया जा सकता है।
श्री कैलाश चंद्र पंत जी के अनुसार, बाबा नीम करौली महाराज और उनके परम भक्त स्वर्गीय मदन नारायण पंत की यह अलौकिक गाथा लालकुआं की धार्मिक-सांस्कृतिक विरासत का एक अमूल्य अध्याय है। निस्संदेह, यह गाथा और पंत परिवार का माँ अवन्तिका देवी और बाबा नीम करौली के प्रति यह पूर्ण समर्पण आज भी स्थानीय लोगों के धार्मिक जीवन का अटूट आधार है। यह श्रद्धा और पवित्र स्मृतियाँ न केवल वर्तमान पीढ़ी के जीवन का संबल हैं, बल्कि आने वाली नई पीढ़ियों को भी सनातन संस्कृति, निश्छल सेवा और उत्तम संस्कारों का मार्ग दिखाने वाला एक शाश्वत प्रेरणा स्रोत बनी रहेंगी।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
