तृषा, तप और तृतीया: वह अतीन्द्रिय रहस्य जिसने औघड़ शिव की महासमाधि तोड़ दी

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सावन मास की रिमझिम फुहारें केवल ग्रीष्म की तपन को ही शांत नहीं करतीं, बल्कि वे सूखी वसुंधरा के आंचल में नवजीवन, चेतना और नव-श्रृंगार का बीजारोपण भी करती हैं। आकाश में घुमड़ते मेघ, मयूरों का नर्तन और वृक्षों की डालियों पर लहराती नई कोपलें—यह सब मिलकर एक ऐसे नैसर्गिक वातावरण की रचना करते हैं जहाँ अध्यात्म और प्रकृति परस्पर आलिंगनबद्ध दिखाई देते हैं। इसी सुरम्य ऋतु में सनातन संस्कृति का अत्यंत मंगलकारी पर्व हरियाली तीज अवतरित होता है।
हरियाली तीज केवल महिलाओं का एक पारंपरिक लोक-उत्सव मात्र नहीं है। यह दर्शन, पौराणिक इतिहास, पर्यावरण चेतना और गृहस्थ जीवन की आत्मिक गरिमा का एक अप्रतिम दस्तावेज है। यह पर्व प्रकृति और पुरुष यानी आद्यशक्ति जगज्जननी भगवती पार्वती और देवाधिदेव भगवान शिव के अमर पुनर्मिलन की पावन गाथा को हर वर्ष नव्यता प्रदान करता है।
पौराणिक पृष्ठभूमि: तप, निष्ठा और शिव-पार्वती का अमर परिणय
पौराणिक ग्रंथों, विशेषकर शिव पुराण, भविष्य पुराण तथा स्कंद पुराण में हरियाली तीज के प्राकट्य की विस्तृत कथा उपलब्ध होती है। शास्त्रों के अनुसार, देवी पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए घोर जंगलों में, बर्फीली चोटियों के मध्य रहकर हज़ारों वर्षों तक कठोर तपस्या की। उन्होंने जल, वायु और शुष्क पर्ण तक का त्याग कर दिया, जिसके कारण उन्हें अपर्णा नाम प्राप्त हुआ।
देवी पार्वती के इस उग्र तप और अनन्य प्रेम से द्रवित होकर सावन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया। महाकवि कालिदास ने अपने महाकाव्य रघुवंशम् में इस अलौकिक युगल की स्तुति करते हुए लिखा है:
वागर्थाविव सम्पृक्तौ वागर्थप्रतिपत्तये।
जगतः पितरौ वन्दे पार्वतीपरमेश्वरौ॥
अर्थ: जिस प्रकार शब्द और उसका अर्थ एक-दूसरे से पूरी तरह अविभाज्य जुड़े होते हैं, उसी प्रकार संपूर्ण जगत के माता-पिता भगवान शिव और माता पार्वती आपस में समाहित हैं। सम्यक ज्ञान की प्राप्ति के लिए मैं उन परम पावन शिव-पार्वती को प्रणाम करता हूँ।
विभिन्न क्षेत्रों में मनाने की समृद्ध सांस्कृतिक परंपराएं
भारत विविधताओं की भूमि है, और हरियाली तीज का पर्व देश के अलग-अलग अंचलों में अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक छटा और अनूठी लोक-परंपराओं के साथ मनाया जाता है:
राजस्थान (जयपुर एवं मारवाड़ अंचल):
राजस्थान में हरियाली तीज का उत्सव अपनी अद्वितीय भव्यता के लिए विश्व प्रसिद्ध है। विशेषकर जयपुर में तीज माता की शाही सवारी निकाली जाती है, जिसमें अलंकृत हाथी, घोड़े, ऊंट और पारंपरिक लोक नर्तक शामिल होते हैं। इस अवसर पर महिलाएं लहरिया साड़ियां और ओढ़नी धारण करती हैं। मारवाड़ और शेखावाटी क्षेत्रों में इस दिन विशेष व्यंजन ‘घेवर’ और ‘फेणी’ बनाकर एक-दूसरे को भेंट करने का शास्त्रीय रिवाज है।
ब्रज मंडल एवं उत्तर प्रदेश:
उत्तर प्रदेश और विशेष रूप से ब्रज क्षेत्र (मथुरा, वृंदावन, गोकुल) में हरियाली तीज झूलन उत्सव के रूप में मनाई जाती है। वृंदावन के प्रसिद्ध श्री बांके बिहारी मंदिर में इस दिन ठाकुर जी को सोने-चांदी के भव्य हिंडोले (झूले) में विराजमान कराया जाता है। पूर्वांचल और अवध के क्षेत्रों में नारियां नीम और बरगद के वृक्षों पर झूले डालती हैं तथा पारंपरिक कजरी और मल्हार लोकगीत गाती हैं।
हरियाणा एवं पंजाब:
हरियाणा और पंजाब में तीज को बेटियां अपने मायके आकर बड़े उत्साह से मनाती हैं। इस अवसर पर ‘कोथली’ की सुंदर परंपरा है, जिसमें भाई अपनी विवाहित बहनों के लिए वस्त्र, मिष्ठान्न, चूड़ियां और श्रृंगार का सामान लेकर जाते हैं। गांवों की चौपालों पर झूले सजते हैं और महिलाएं मालपुए व खीर बनाकर त्योहार का आनंद लेती हैं।
बिहार एवं मिथिलांचल:
बिहार और मिथिलांचल क्षेत्र में हरियाली तीज को सांस्कृतिक मर्यादा और शास्त्रीय निष्ठा के साथ मनाया जाता है। नवविवाहित स्त्रियों के लिए यह पर्व विशेष महत्व रखता है। मिथिला में इस समय मधुश्रावणी का पावन विधान भी चलता है, जहाँ कथा-श्रवण और मिट्टी के गौरी-शंकर बनाकर विशेष पूजा अर्चना की जाती है।
मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़:
मध्य प्रदेश और मालवा-बुंदेलखंड क्षेत्रों में हरियाली तीज पर प्रकृति-पूजन का विशेष विधान है। नदियां और सरोवरों के तटों पर महिलाएं एकत्रित होकर गीली मिट्टी से शिव-पार्वती की प्रतिमाएं बनाती हैं और सुहाग की सामग्री अर्पित करती हैं।
प्रकृति और शक्ति का सनातन दर्शन
सनातन संस्कृति में प्रकृति को साक्षात् भगवती का स्वरूप माना गया है। देवी सूक्तम् में ऋषियों ने प्रकृति की वंदना करते हुए स्पष्ट उद्घोष किया है:
नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः।
नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः प्रणताः स्मताम्॥
अर्थ: उन देवी, महादेवी तथा निरंतर कल्याणमयी शिव स्वरूपिणी को बारंबार नमस्कार है। कल्याण करने वाली मूल प्रकृति देवी को हम नियमपूर्वक प्रणाम करते हैं।
हरियाली तीज पर जब संपूर्ण धरा हरी-भरी हो उठती है, तब नारियां भी हरे वस्त्र, हरी चूड़ियां और सोलह श्रृंगार धारण करती हैं। यह हरा रंग आशा, समृद्धि, उर्वरता और सतत प्रवाहमान जीवन का द्योतक है।
पूजन विधान एवं पावन मंत्र
हरियाली तीज के दिन महिलाएं निर्जला या फलाहारी व्रत रखकर संध्या काल में माता पार्वती और भगवान शिव का विशेष पूजन करती हैं। इस अवसर पर भगवती की कृपा प्राप्ति हेतु इस मंत्र का उच्चारण किया जाता है:
सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यम्बके गौरि नारायणि नमोऽस्तु ते॥
अर्थ: हे सर्वमंगलदायिनी, कल्याणमयी, समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली, शरणागत वत्सला, त्रिनेत्रधारिणी गौरी! हे नारायणी! आपको बारंबार नमस्कार है।
तत्पश्चात अखंड सौभाग्य और परिवार के आरोग्य की कामना हेतु इस ऋचा का जप किया जाता है:
देहि सौभाग्यमारोग्यं देहि मे परमं सुखम्।
रूपं देहि जयं देहि यशो देहि द्विषो जहि॥
अर्थ: हे माँ गौरी! मुझे सौभाग्य, आरोग्य और परम सुख प्रदान कीजिए। मुझे सद्गुण रूप, विजय और यश प्रदान कीजिए तथा मेरे आंतरिक विकारों का नाश कीजिए।
आधुनिक संदर्भ में पर्व की प्रासंगिकता
1. दांपत्य में धैर्य और समर्पण: माता पार्वती की तपस्या हमें यह सिखाती है कि किसी भी पवित्र संबंध की नींव केवल भौतिक आकर्षण पर नहीं, बल्कि अथक धैर्य, अटूट निष्ठा और परस्पर सम्मान पर आधारित होती है।
2. पर्यावरण चेतना: जलवायु परिवर्तन के इस दौर में हरियाली तीज हमें संदेश देती है कि प्रकृति का संरक्षण ही मानव जाति का संरक्षण है।
3. सामाजिक समरसता: तीज जैसे लोक-उत्सव परिवार और समाज के बिखराव को रोकते हैं तथा जनमानस में नए उत्साह और आत्मीयता का संचार करते हैं।
कुल मिलाकर
हरियाली तीज केवल अतीत की किसी घटना का स्मरण मात्र नहीं है; यह सनातन चेतना का वह जीवंत प्रवाह है जो हर वर्ष हमारे भीतर भक्ति, प्रेम और लोक-मंगल की भावना को नया जीवन देता है।
गौरि उमा त्र्यम्बके देवि सृष्टि-स्थिति-विनाशिनी।
संसारतारिणी गौरि प्रसीद परमेश्वरि॥

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