जब देवदारु के वनों में गिरा अनन्त कांति का वो ज्योतिःपुंज… जानिए कैसे उपजा ब्रह्मांड का पहला शिवलिंग!
सती-विरह से जन्मा वैराग्य और महालिंग के अवतरण की परम पावन कथा
उत्तराखंड के सुरम्य जनपद अल्मोड़ा में गगनचुंबी प्राचीन देवदार के वृक्षों की छाया और कल-कल बहती पवित्र जटागंगा के तट पर बसा जागेश्वर धाम केवल एक तीर्थस्थल नहीं, अपितु महादेव के वैराग्य और असीम करुणा का प्रत्यक्ष साक्ष्य है। स्कंद पुराण के मानसखंड के अनुसार, यही वह पावन ‘दारुकवन’ है जहाँ ऋषियों के अज्ञानतापूर्ण शाप के माध्यम से भगवान शिव का सर्वप्रथम इस धरा पर लिंग रूप में प्रकट हुए इस अलौकिक इतिहास का प्रारंभ उस समय से होता है जब प्रजापति दक्ष ने एक विशाल यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में समस्त देवी-देवताओं को आमंत्रित किया गया, किंतु अपने दामाद भगवान शिव और पुत्री सती को निमंत्रण नहीं भेजा गया। पिता के गृह में हो रहे उत्सव का समाचार पाकर माँ सती बिना बुलाए ही वहाँ पहुँच गईं। परंतु वहाँ उन्हें अपने पिता द्वारा घोर अपमानित होना पड़ा। अपने स्वामी और स्वयं के इस अनादर को सहन न कर पाने के कारण माँ सती ने यज्ञ वेदी की योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
जब भूतभावन भगवान शिव को सती के देहत्याग का समाचार मिला, तो उनका क्रोध प्रलयंकर रूप धारण कर गया। उन्होंने दक्ष का यज्ञ विध्वंस कर दिया। तत्पश्चात सती के विरह और अनन्य शोक में डूबकर महादेव ने सर्वस्व त्याग दिया और अपने मस्तक पर कपाल धारण कर परम वैराग्य अपना लिया।
कर्पूरगौरं करुणावतारं संसारसारम् भुजगेन्द्रहारम्।
सदावसन्तं हृदयारविन्दे भवं भवानीसहितं नमामि॥
अपने शरीर पर भस्म रमाए, बाघांबर पहने और सर्पों की माला धारण किए भगवान शिव एक अवधूत रूप में हिमालय के इसी सघन ‘दारुकवन’ में आ पहुँचे और गहन ध्यान-तपस्या में लीन हो गए। पुराणों में वर्णित यह पावन कथा बड़ी रोचक है
देवदारु के घने वनों में छिपा मुक्ति का अंतिम रहस्य
हिमालय की पावन और पवित्र गोद में स्थित एक ऐसा रहस्यमयी वन है, जहाँ की सुरम्य वायु में भक्ति का मधुर गंध और शांत चेतना संचरित होती है। व्यास जी मानसखण्ड का दिव्य वृत्तांत सुनाते हुए कहते हैं कि दारुकानन नाम का वह सुरम्य पर्वतराज सिद्धों, विद्याधरों, महर्षियों, देवताओं और नागों द्वारा नित्य सेवित है। वहाँ ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों ही परात्पर सत्ताएँ निवास करती हैं और देवी पार्वती के साथ भगवान शंकर हर पद पर पूजित हैं। जब ऋषियों ने व्यास जी से पूछा कि इस धरा पर ऐसा कौन सा दिव्य स्थान है, जहाँ क्षण भर की उपासना से ही मनुष्य महापातकों से छूटकर शिव पद को प्राप्त कर सकता है, तब व्यास जी ने मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम के पुत्र कुश और महर्षि वसिष्ठ के मध्य हुए पावन संवाद का स्मरण कराया।
राजकुमार कुश ने बड़े ही आर्त और जिज्ञासु भाव से महर्षि वसिष्ठ से पूछा था:
पात्कानां विनाशाय भूतले मुनिसत्तम। कः क्षेत्रः प्रवरः ह्यातः को देवो भवतां मते॥
अर्थात् हे मुनिश्रेष्ठ! इस पृथ्वी पर पापों के विनाश के लिए सबसे उत्तम क्षेत्र कौन सा है और किस देव की आराधना से मनुष्य यमलोक के दारुण कालपाश से बिना किसी कष्ट के मुक्त हो जाता है? तब वसिष्ठ जी ने बतलाया कि इसी जिज्ञासा को शांत करने के लिए ज्ञानी ऋषिगण सत्यलोक से भगवान विष्णु के वैकुण्ठ भवन पहुँचे थे। वैकुण्ठ में प्रभु की स्तुति करते हुए ऋषियों ने गद्गद स्वर में कहा:
नमस्ते पद्मनाभाय शङ्खचक्रगदाधराय च। श्रीवत्सवक्षसे तुभ्यं वनमालाधराय च॥
हे सहस्रशीर्षा पुरुष! हे लक्ष्मीपते! जो प्राणी अज्ञान, विषय-वासनाओं और अज्ञानवश महापापों में डूब चुके हैं, उनके उद्धार का सुलभ मार्ग क्या है? ऋषियों की इस निष्छल और करुणापूर्ण प्रार्थना को सुनकर भगवान श्रीहरि ने मुस्कुराते हुए अपनी करतल-हथेली पर ही समस्त भूमण्डल, सात समुद्रों, सरिताओं और पर्वतों को प्रकट कर दिया। उन्होंने उंगली उठाकर हिमालय की छाती से लगे उस अलौकिक क्षेत्र दारुकानन की ओर संकेत किया, जहाँ शिव जी की जटाओं से प्रकट हुई पापनाशिनी जटागंगा और विष्णु के श्रीचरणों से निकली अलकनंदा का संगम होता है। उसी संगम के मध्य में त्रिलोक का अंधकार मिटाने वाला ज्योतिर्मय महालिंग यागीश्वर (जागेश्वर) के नाम से प्रज्वलित हो रहा था।
भगवान विष्णु ने ऋषियों को उस क्षेत्र का माहात्म्य बतलाते हुए कहा:
हिमालयतटे रम्ये सम्भूता सरयू नदी। तस्या दक्षिणपार्श्वे वै सुपुण्यं दारुकाननम्॥
हिमालय के मनोहर तट पर प्रवाहित सरयू के दक्षिण में यह पावन दारुकानन स्थित है। यहाँ का एक स्पर्श अश्वमेध यज्ञ का फल देता है और इसके दर्शन मात्र से सैकड़ों जन्मांतरों के पाप भस्म हो जाते हैं। मानसरोवर, तृप्ति-सरोवर, रामह्रद और सीताह्रद जैसे पवित्र कुंडों से घिरा यह धाम सर्वपापहर है।
किंतु दारुकानन की इस अनन्त महिमा के पीछे छिपा है एक ऐसा घोर इतिहास, जिसे सुनकर किसी भी सहृदय का कलेजा काँप उठे। सुमन्तु गोत्र में उत्पन्न धर्मनिष्ठ ब्राह्मण सुवट का पुत्र था सुजामलि। कुसंगति के विषैले भंवर में फँसकर सुजामलि ने वेदों की निंदा शुरू कर दी और जुए तथा काम-वासना के अधर्म में डूब गया। एक दिन जब उसकी स्नेहमयी, हितकारिणी वृद्धा माता ने उसे वेश्याओं के साथ क्रीड़ा करते देखा और ममतामयी वाणी में अधर्म त्यागने की सीख दी, तो पाप में अंधा हो चुके सुजामलि के मस्तिष्क पर क्रूरता का भूत सवार हो गया। उसने बिना एक क्षण सोचे, तीखी कुल्हाड़ी उठाई और अपनी ही जननी का वध कर डाला।
मातृघाती सुजामलि फिर भी न रुका; वह उस वेश्या को साथ लेकर मिथिला नगरी चला गया और वहाँ राजपुत्र के साथ सौ-सौ दाँव की जुए की बाजी लगाने लगा। जब जुए में सब कुछ हारकर कंगाल हो गया, तो वह चोरी करने लगा। अंततः एक रात नगरवासियों ने उसे चोरी करते रंगे हाथों पकड़ लिया और लोहे की भारी जंजीरों में कसकर बाँध दिया। जब वह बेड़ियों में जकड़ा अंधकार में पड़ा था, तब उसके भीतर सोई हुई चेतना अचानक जाग उठी। उसे अपनी ममतामयी माँ की वह अंतिम करुण पुकार याद आई, जो कुल्हाड़ी के वार से ठीक पहले उसके होठों से निकली थी। वह चीख-चीख कर रोने लगा।
जब नागरिकों ने उससे पूछा कि बेड़ियों के कष्ट से क्यों रो रहे हो, तो उस पातकी ने अश्रुपूर्ण नेत्रों से कहा कि मैं लोहे की बेड़ियों के डर से नहीं, बल्कि अपनी माँ की निर्मम हत्या के महापाप के दंश से रो रहा हूँ! उसकी पश्चाताप से भरी इस वेदना को देखकर मिथिला के एक ब्रह्मज्ञानी संत को दया आ गई और उन्होंने उसे जंजीरों से मुक्त करा दिया।
मुक्त होकर सुजामलि ने रोते हुए संत के चरणों में गिरकर पूछा कि क्या मुझ जैसे मातृघाती, गोघ्न, कुमार्गगामी जीव के लिए भी ब्रह्मा के विधान में कोई क्षमा है? क्या मेरा यह घोर पाप किसी भी उपाय से मिट सकता है?
तब उस तपोनिष्ठ तपस्वी ने उसे ढांढस बँधाते हुए कहा कि यद्यपि मातृ-हत्या का पाप सौ जन्मों में भी नहीं मिटता, फिर भी भगवान शिव की करुणा असीम है। तुम हिमालय की तलहटी में स्थित दारुकानन में जाओ, जहाँ ज्योतिर्मय यागीश्वर महादेव जाग्रत स्वरूप में विराजे हैं। वहाँ जटागंगा में स्नान करके जो प्राणी निष्पाप भाव से भगवान यागीश्वर का एक मास तक पूजन करता है, उसे काशी में आठ हजार वर्षों तक तपस्या करने या केदारनाथ व रामेश्वरम के दर्शन के समान मुक्ति-फल सहज ही प्राप्त हो जाता है। दारुकानन का वह पावन क्षेत्र पतित से पतित आत्मा को भी शिवत्व की अमर छाया प्रदान करता है और यागीश्वर महादेव का ध्यान करते ही प्राणी भवबंधन से सदा के लिए मुक्त हो जाता है।
नरभक्षी का भयानक अभिशाप और देवदारु के अरण्य में प्रज्वलित काल-नाशक रहस्य
मातृघाती सुजामलि को जब सिद्ध तपस्वी ने दारुकानन की पावन महिमा बतलाई, तब ऋषियों के मन में उस परम दिव्य धाम के अन्य गोपनीय रहस्यों को जानने की तीव्र उत्कंठा जाग उठी। ऋषियों ने विनीत भाव से व्यास जी से पूछा कि हे मुनिश्रेष्ठ! उस पावन वन में कौन-कौन से गोपनीय शिवलिंग और तीर्थ विद्यमान हैं, जिनके दर्शन मात्र से प्राणी कालपाश से मुक्त हो जाता है? तब महर्षि वसिष्ठ ने एक और अत्यंत विस्मयकारी और रोंगटे खड़े कर देने वाली कथा का वर्णन आरंभ किया।
प्राचीन काल में ‘रिचक’ नाम का एक परम धार्मिक गंधर्व था, जिसका पुत्र संगीत, नृत्य और समस्त कलाओं में अनुपम और परम रूपवान था। वह सर्वज्ञ और संयमी था। किंतु एक समय दैवयोगवश कामदेव के वशीभूत होकर वह ज्ञानियों और तपोनिष्ठ ऋषियों की पावन सभा के मध्य ही गंधर्व कन्याओं के साथ विलास की चेष्टा करने लगा। उसके इस अमर्यादित और अशिष्ट व्यवहार को देखकर धर्मवत्सल महर्षिगण अत्यंत कुपित हो उठे और उन्होंने उस कुलघाती गंधर्व को घोर शाप देते हुए कहा:
यस्मात्त्वं मध्यगो भूत्वा गतोऽसि कुलपांसन।
तस्मात्त्वं राक्षसीं योनि प्राप्य घोरतमो भव॥
अर्थात, हे मर्यादा का उल्लंघन करने वाले अधम! तू ऋषियों की पावन सभा में रहकर भी कुल को कलंकित करने वाला आचरण कर रहा है, इसलिए तू तत्काल अपने इस दिव्याकृति शरीर को त्यागकर अत्यंत विकराल और घोर नरभक्षी राक्षस योनि को प्राप्त हो जा।
ऋषियों के इस अमोघ शाप के प्रभाव से उस गंधर्व का दिव्य रूप क्षण भर में विलीन हो गया। उसने घोर नरभक्षी राक्षस का भयावह रूप धारण कर लिया और घने जंगलों में मनुष्यों का संहार करने लगा। उस दुर्मति ने अपनी अति-सुंदर बहन के साथ भी राक्षसी परंपरा में अधर्मयुक्त आचरण किया और भयंकर पापकर्मों में लीन रहा। वह यमदूत के समान दिखने वाले राक्षसों के दल के साथ वनों, उपवनों और नदियों के तटों पर भटकता हुआ निरपराध प्राणियों का रक्त बहाता रहा।
फिर एक दिन दैवयोग से भटकते-भटकते वह भयंकर राक्षस अपनी बहन और राक्षस समूह के साथ उसी पावन दारुकानन के अरण्य में जा पहुँचा। वहाँ पहुँचते ही उसकी दृष्टि मुक्तिमण्डल के मध्य सूर्य के समान प्रदीप्त, अलौकिक कांति से दैदीप्यमान देवदेव भगवान यागीश्वर (जागेश्वर) महादेव पर पड़ी। उसने देखा कि ब्रह्मा, विष्णु, बाणासुर, नंदी, स्कंद, गणेश और गंधर्वगण भावविभोर होकर प्रभु की दिव्य सेवा में लीन हैं।
उस भयंकर नरभक्षी राक्षस के भीतर जाने कैसे पूर्व जन्म के पुण्यों का अंकुर फूटा और उसने परम भक्ति भाव से उस ज्योतिर्मय शिवलिंग को नतमस्तक होकर साष्टांग प्रणाम किया।
प्रणाम करते ही एक अलौकिक चमत्कार घटित हुआ! केवल एक निष्छल प्रणाम के प्रभाव से उसका घोर राक्षसी शरीर तत्काल भस्म होकर छूट गया और उसने पुनः अपना पूर्व दिव्य गंधर्व रूप प्राप्त कर लिया। दिव्य चेतना लौटते ही उसे अपने माता-पिता का स्मरण हो आया। पुत्र के स्मरण मात्र से उसके माता-पिता भी सब मोह छोड़कर भगवान शंकर के पावन मंदिर में उपस्थित हो गए। वह गंधर्व अश्रुपूर्ण नेत्रों से भगवान यागीश्वर के सम्मुख हाथ जोड़कर मुक्ति की याचना करने लगा।
तब देवाधिदेव महादेव की असीम अनुकंपा से रुद्रकन्याओं द्वारा सेवित एक दिव्य विमान उतरा और वह गंधर्व अपने परिजनों के साथ समस्त पापों से मुक्त होकर परम धाम शिवलोक को प्रस्थान कर गया।
इसके पश्चात महर्षि वसिष्ठ ऋषियों से कहते हैं कि उस पावन दारुकानन में तीन सौ ऐसे अति-गोपनीय शिवलिंग हैं, जो शिलाओं और गुफाओं में छिपे हुए हैं। जो मनुष्य श्रद्धायुक्त होकर यागीश्वर महादेव का दर्शन-पूजन करता है, उसके पश्चात मृत्युंजय, विश्वेश्वर, गोकर्णेश, विंध्येश्वर, वाणीश्वर, भुवनेश्वर, महाकाल, और सोमेश्वर महादेव की आराधना करता है, उसे दुर्लभ शिव सायुज्य मुक्ति मिलती है।
वहाँ विश्वकर्मा द्वारा निर्मित महादेवी पुष्टि, कमलाकांत, ब्रह्मा, गणेश, नंदीश्वर, नंदा देवी, चंडीश्वर, शीतला देवी, वरुणेश, कपालपाणि, कोटिश्वर और भैरवेश्वर की अलौकिक उपस्थिति है। जो भक्त शूलगंगा के पावन जल में स्नान करके पितरों का पिंडदान करता है, वह अपने एक सौ एक कुलों का उद्धार कर देता है। जटागंगा और सरयू के इस पावन संगम का जलपान करने मात्र से मनुष्य को सोमपान का अमर फल प्राप्त होता है।
महर्षि आगे बतलाते हैं कि यागीश्वर महादेव का पूजन शास्त्रोक्त आगम विधि से करना चाहिए। पंचरत्नों से युक्त शुभ कलश स्थापित करके उस पर गणेश और कार्तिकेय का आवाहन करें। अर्घ्य, प्राणायाम, अंगन्यास और मातृकान्यास करके द्वाविंशाक्षर और द्वादशाक्षर मंत्रों से प्रभु का ध्यान करें। पंचामृत और पावन जल से अभिषेक कर चंदन, अगरु-धूप, दीप और घृतयुक्त पायस का नैवेद्य अर्पित करें।
फिर गद्गद कंठ से भगवान नीलकंठ की स्तुति करते हुए कहें:
नमः शिवाय शशिशेखराय हराय कालान्तकराय तुभ्यम्।
भस्माङ्गरागाय रविप्रभाय देवाय तुभ्यं मदनान्तकाय॥
अर्थात, जिनके मस्तक पर चंद्रमा सुशोभित है, जो काल का भी अंत करने वाले कालंतक हैं, जिनका अंगराग भस्म है और जो सूर्य के समान तेजस्वी हैं, उन कामंतक भगवान सदाशिव को बारंबार प्रणाम है। जो भक्त इस प्रकार दारुकानन में तीन रात्रि तक निराहार रहकर यागीश्वर महादेव का ध्यान और पूजन करता है, वह संसार चक्र के समस्त दुःखों से छूटकर परम पद शिवलोक को प्राप्त होता है।
क्या अपनी जन्मदात्री के रक्त से सने हाथों को मिलेगी महाकाल की अभय छत्रछाया?
जब सिद्ध तपस्वी ने मातृघाती सुजामलि को मुक्ति का मार्ग बतलाया और निष्छल भाव से भगवान भवानीवल्लभ की आराधना करने का विधान समझाया, तब सुजामलि के पश्चाताप-दग्ध हृदय में आस की एक नई किरण जगमगा उठी। तपस्वी मुनि ने उसे अंतिम विदाई देते हुए कहा था कि हे द्विज! जीवन में जाने-अनजाने किए गए कायिक, वाचिक और मानसिक पापों को जब प्राणी निष्कपट भाव से प्रभु के सम्मुख स्वीकार कर लेता है, तब भगवान महेश्वर उसे परम सिद्धि प्रदान करते हैं। मुनिराज के वचनों का स्मरण करते हुए उन्होंने कहा था:
कायिकान्वाचिकान्वापि मनसा च कृतानपि। ततस्तु प्रार्थयेद्देवं मुक्त्यर्थं द्विजसत्तम॥
तपस्वी मुनि के इन अभयकारी वचनों को शिरोधार्य करके वह पापी ब्राह्मण अश्रुपात करता हुआ उत्तर दिशा की ओर दारुकानन की यात्रा पर निकल पड़ा। चलते-चलते जब उसने उस पावन अरण्य में प्रवेश किया, तो उसे सर्वत्र शांति और अलौकिक सुगंध का अनुभव हुआ। वह वन सिद्धों, गंधर्वों, मनुष्यों और ब्रह्मादि देवों द्वारा नित्य सेवित था। नंदनवन से लाए गए कल्पवृक्षों से आच्छादित उस गहन अरण्य के मध्य में उसने रुद्रकन्याओं से घिरे, हजारों सूर्यों के समान अपनी आभा से संपूर्ण आकाश को आलोकित करते हुए भगवान यागीश्वर महादेव के दर्शन किए।
गणपति और नंदीश्वर आदि गणों से सुशोभित उस दिव्य ज्योतिर्मय स्वरूप को देखते ही पाप के अगाध सागर में डूबे सुजामलि का हृदय प्रफुल्लित हो उठा। उसने संपूर्ण श्रद्धा से दंडवत प्रणाम किया और दारुकानन के समस्त पापनाशक तीर्थों में विधि-विधानपूर्वक स्नान किया। त्रिनेत्र-लिंग और वृद्ध-यागीश्वर का दर्शन कर वह परम पावन ब्रह्मतीर्थ के तट पर पहुँचा। वहाँ उसने लगातार सात रात्रियों तक निराहार रहकर, जितेन्द्रिय होकर भगवान यागीश्वर की अनन्य भाव से उपासना की। तत्पश्चात ब्रह्मतीर्थ में अपने पितरों का तर्पण और श्राद्ध किया, जिसके प्रभाव से उसके एक सौ एक कुलों के पितृगण तत्काल पापमुक्त होकर परम गति को प्राप्त हो गए।
इसके बाद वह विप्र कांपती देह और सजल नेत्रों से भगवान यागीश्वर की पावन चौखट पर पुनः जा गिरा और अपने हृदय के कपाट खोलकर अपने घोर कृत्य को प्रभु के सामने पुकार-पुकार कर कहने लगा:
मया स्वमाता निहता महेश! तथा हि वेश्यागमनादिकं च।
पापस्य मे पापरातस्य शम्भो कुरुष्व मुक्तिं प्रणतोऽस्मि तुभ्यम्॥
अर्थात हे महेश! हे शंभो! मैंने तीक्ष्ण धार से अपनी ही स्नेहमयी जननी की हत्या की है और वेश्यागमन जैसे घृणित दुष्कर्मों में जीवन व्यतीत किया है। मैं पापियों में भी महापापी हूँ, किंतु आज आपकी शरण में आ गिरा हूँ। हे दयानिधि! मुझ पतित का उद्धार कर मुझे मुक्ति प्रदान कीजिए।
सुजामलि के हृदय से निकली उस पश्चातापमयी करुण पुकार को सुनकर करुणामय भगवान शिव का हृदय द्रवित हो उठा। देवाधिदेव महादेव ने उस मातृघाती ब्राह्मण के समस्त पातकों को क्षण भर में भस्म कर उसे वह दुर्लभ सायुज्य मुक्ति प्रदान कर दी, जो बड़े-बड़े योगियों के लिए भी दुःसाध्य है।
भगवान विष्णु ऋषियों को यह परम रहस्य बतलाते हुए बोले कि हे मुनिवरों! जहाँ गौ, ब्राह्मण, गुरु और बालकों की हत्या करने वाले महापातकी भी केवल यागीश्वर महादेव की अनुकंपा से परम गति को प्राप्त हो जाते हैं, उस दारुकानन से बढ़कर इस धरा पर कोई अन्य मुक्ति-क्षेत्र नहीं है। इसलिए आप सभी एकाग्रचित्त होकर उस दिव्य क्षेत्र में जाएँ और जन-कल्याण के लिए इस महिमा का प्रसार करें। वहाँ ब्रह्मतीर्थ के मध्य में ब्रह्मा जी के साथ मेरी भी पावन प्रतिमा स्थित है, जिसके दर्शन मात्र से मनुष्य के समस्त पाप विलीन हो जाते हैं।
महर्षि वसिष्ठ कथा का समापन करते हुए बोले कि हे ऋषियों! मुनियों को यह अमृतमयी वाणी सुनाने के पश्चात भगवान श्रीहरि सबके देखते-ही-देखते वहीं अंतर्धान हो गए। प्रभु के अंतर्धान होने पर समस्त ऋषिगण संशयमुक्त और निष्पाप होकर अत्यंत प्रसन्न भाव से स्वाध्याय और लोककल्याण के लिए अपने-अपने आश्रमों को लौट गए। जो भी मनुष्य इस पावन दारुकानन और यागीश्वर महादेव के माहात्म्य का भक्तिपूर्वक श्रवण या पठन करता है, वह इस संसार के समस्त पापों और भयों से मुक्त होकर अंत में शिवलोक की अमर छाया को प्राप्त कर लेता है।
पौराणिक मान्यतानुसार, जागेश्वर को भगवान शिव के द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक ‘नागेशं दारुकावने’ माना जाता है। द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में इसका प्रत्यक्ष उल्लेख मिलता है:
> सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।
> उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारममलेश्वरम्॥
> केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम्।
> वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे॥
> वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने।
> सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये॥
पांडवों की मुक्ति-यात्रा:
महाभारत काल में कुरुक्षेत्र के युद्ध के उपरांत गोत्र-वध के पाप-ताप से मुक्ति पाने हेतु पांडवों ने हिमालय की ओर प्रस्थान किया था। मान्यता है कि उन्होंने जागेश्वर में रुककर भगवान महामृत्युंजय की विशेष आराधना की थी।
जगतगुरु आदि शंकराचार्य जी का आगमन:
8वीं शताब्दी में सनातन संस्कृति के पुनरुद्धार हेतु जब आदि शंकराचार्य जी कुमाऊँ क्षेत्र पधारे, तो उन्होंने जागेश्वर के मंदिर समूह का पुनर्निर्माण कराया तथा पूजन की वैदिक पद्धतियों को पुनः स्थापित किया।
स्थापत्य कला एवं मुख्य मंदिर समूह
जागेश्वर धाम में केदारनाथ शैली और नागर शैली के अद्भुत सम्मिश्रण से निर्मित 125 से अधिक प्राचीन मंदिरों का समूह है। इनका निर्माण 7वीं से 14वीं शताब्दी ईस्वी के मध्य कत्युरी राजवंश के राजाओं द्वारा कराया गया था:
महामृत्युंजय मंदिर
|संपूर्ण परिसर का सबसे प्राचीन मंदिर। यहाँ अकाल मृत्यु से रक्षा और आरोग्य प्राप्ति हेतु महामृत्युंजय जाप का विधान है। |
जागेश्वर मुख्य मंदिर | ‘यागीश्वर’ (यज्ञों के स्वामी) रूप में पूजित बाल-शिव का पावन स्थान। |
दंडेश्वर महादेव | मुख्य परिसर से लगभग 2 किमी दूर स्थित, जहाँ भगवान शिव विशाल दंडधारी स्वरूप में विराजित हैं। इसका शिखर अत्यंत ऊँचा और भव्य है। |
पुष्टि देवी मंदिर | भगवान शिव के समीप ही विराजित जगदम्बा का पावन स्वरूप, जो भक्तों की मनोकामनाएँ पूर्ण करती हैं। |
सांस्कृतिक एवं साहित्यिक महत्व
श्रावणी मेला:
प्रतिवर्ष श्रावण मास में यहाँ विशाल सांस्कृतिक व धार्मिक मेले का आयोजन होता है, जहाँ दूर-दूर से कांवड़िये जटागंगा का पावन जल लेकर महादेव का जलाभिषेक करते हैं।
लेटैस्ट न्यूज़ अपडेट पाने हेतु -
👉 वॉट्स्ऐप पर हमारे समाचार ग्रुप से जुड़ें
