हिमालय के सीने पर जमी बर्फ से बने साक्षात ‘ॐ’ का वो विस्मयकारी महा-रहस्य, जिसके आगे विज्ञान ने भी मान ली हार और जहां आज भी आधी रात को गूंजता है ब्रह्मांड का आदि स्वर
त्रिलोक का वो सबसे बड़ा दिव्य रहस्य, जहां केवल ‘हिम’ शब्द के उच्चारण से मिट जाते हैं जन्मों के पाप और साकार होता है काशी जैसा पुण्य
सनातन संस्कृति में हिमालय को मात्र एक पर्वत श्रृंखला नहीं, बल्कि देवात्मा माना गया है। वेदों और पुराणों में इस देवभूमि के कण-कण में साक्षात् शिव का वास बताया गया है। इसी पावन हिमालय के मानसखंड क्षेत्र में स्थित है एक अत्यंत रहस्यमयी और विस्मयकारी शिखर, जिसे हम ॐ पर्वत के नाम से जानते हैं। कैलाश मानसरोवर यात्रा और आदि कैलाश मार्ग पर स्थित यह पर्वत कोई साधारण चोटी नहीं, बल्कि सनातन संस्कृति का वो जीवंत दस्तावेज़ है जिसे देखकर आधुनिक विज्ञान भी मौन रह जाता है। स्कन्दपुराण के मानसखंड में वर्णित कथाओं के अनुसार, कैलाश क्षेत्र और उसके आस-पास के हिम शिखर दिव्य शक्तियों के केंद्र हैं। पुराणों में स्पष्ट कहा गया है कि हिमालय के इन शिखरों का या केवल ‘हिम’ शब्द का उच्चारण करने मात्र से ही मनुष्य के जन्मों-जन्मों के पाप विलीन हो जाते हैं। इस पर्वत की सबसे बड़ी विशेषता इसका अलौकिक और प्राकृतिक स्वरूप है। शीतकाल में जब यहाँ बर्फ गिरती है, तो वह प्राकृतिक रूप से इस प्रकार जमा होती है कि काले पत्थरों के बीच श्वेत बर्फ की लकीरें साक्षात् ‘ॐ’ की आकृति में उभर आती हैं। वैदिक ग्रंथों में ‘ॐ’ को ब्रह्मांड की मूल ध्वनि, अनाहत नाद और परमेश्वर का साक्षात् प्रतीक माना गया है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, यह कोई साधारण भौगोलिक घटना नहीं है, बल्कि भगवान शिव की माया और उनकी उपस्थिति का जीवंत प्रमाण है, मानो पूरी प्रकृति यहाँ मौन रहकर भी महादेव के मूल मंत्र का जाप कर रही हो।
स्कन्दपुराण के अंतर्गत यह भी वर्णित है कि हिमालय के इस दिव्य क्षेत्र में पाँच अत्यंत पवित्र शिखर दिखाई देते हैं, जो इस पावन भूमि के सुंदर विभाजक हैं। इन शिखरों में आध्यात्मिक दृष्टिकोण से ॐ पर्वत का स्थान अत्यंत गोपनीय और पूजनीय माना जाता है। मान्यता है कि पूरे हिमालय क्षेत्र में कुल आठ स्थानों पर प्राकृतिक रूप से ‘ॐ’ की आकृति अंकित है, लेकिन भूलोक पर केवल इसी पर्वतराज के दर्शन इंसानों को नसीब होते हैं, शेष सात आज भी देवताओं के गुप्त लोकों में छिपे हैं। महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में भी इस बात का स्पष्ट संकेत मिलता है कि जब पांडव स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर बढ़े थे, तब उन्होंने इन दिव्य हिम शिखरों के दर्शन किए थे। ऋषियों और मुनियों ने सदियों तक इस क्षेत्र में कठोर तपस्या की है क्योंकि यहाँ की वायु और हिम कणों में एक अनोखा आध्यात्मिक स्पंदन होता है। इस पावन शिखर और संपूर्ण मानसखंड क्षेत्र का महत्व काशी जैसे महान और जाग्रत तीर्थ के समान ही फलदायी माना गया है, जिसके केवल स्मरण मात्र से ही काशीवास जैसा पुण्य प्राप्त हो जाता है। जहाँ काशी में साक्षात् विश्वनाथ सदा जाग्रत रहकर जीवों का कल्याण करते हैं, वहीं मानसखंड के इन दुर्गम हिम शिखरों पर साक्षात् शिव तत्व साकार रूप में प्रकट होता है।
भौगोलिक दुर्गमता और यात्रा के रोमांच की बात करें तो जिला मुख्यालय धारचूला से ओम पर्वत के मुख्य दर्शन स्थल नाभिढांग की दूरी लगभग 95 से 100 किलोमीटर है। सीमा सड़क संगठन द्वारा बनाई गई नई और सुगम ऑलवेदर सड़क के कारण अब धारचूला से गूंजी होते हुए नाभिढांग तक का सफर बेहद आसान हो गया है। समुद्र तल से लगभग 18,340 फीट की अत्यंत विहंगम ऊंचाई पर गर्व से मस्तक उठाए खड़े इस पर्वत की शिखाओं को देखने के लिए श्रद्धालु इसके ठीक सामने लगभग 14,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित नाभिढांग पहुंचते हैं। भारत, नेपाल और तिब्बत की सीमाओं के बेहद करीब होने के कारण सामरिक दृष्टि से यह क्षेत्र अत्यंत संवेदनशील है, इसलिए यहाँ जाने वाले प्रत्येक यात्री को धारचूला से इनर लाइन परमिट लेना अनिवार्य होता है, जिसके बिना आगे बढ़ने की अनुमति नहीं मिलती। यहाँ की ठंडी और विरल हवाओं में सांस लेते हुए जब यात्री इस दिव्य आकृति को देखता है, तो उसकी सारी शारीरिक थकान पल भर में कपूर की तरह उड़ जाती है।
हाड़ कंपा देने वाली इस बर्फीली ऊंचाई पर श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सुविधा के लिए अब ठहरने और भोजन के पुख्ता इंतजाम किए गए हैं। यात्रा के मुख्य पड़ाव गूंजी और नाभिढांग में कुमाऊं मंडल विकास निगम के सुसज्जित पर्यटक आवास गृह और टेंट कॉलोनियां मौजूद हैं, जहां गर्म पानी से लेकर पौष्टिक भोजन की व्यवस्था रहती है। इसके अलावा, व्यास घाटी के नाभि, गूंजी और कुटी जैसे पारंपरिक गांवों में स्थानीय ‘रंग’ समुदाय द्वारा संचालित होमस्टे पर्यटकों के लिए एक वरदान की तरह हैं। इन लकड़ी और पत्थरों से बने पारंपरिक घरों में रहकर यात्रियों को न केवल भीषण ठंड से निजात मिलती है, बल्कि यहाँ की समृद्ध जनजातीय संस्कृति, उनके अनूठे लोकगीत और पहाड़ी व्यंजनों का स्वाद भी करीब से जानने को मिलता है। सीमा पर मुस्तैद आईटीबीपी और भारतीय सेना के जवान यहाँ आने वाले हर नागरिक के लिए सुरक्षा चक्र और आपातकालीन चिकित्सा सहायता के रूप में चौबीसों घंटे तैनात रहते हैं।
सुबह के समय जब सूर्य की पहली रश्मि ओम पर्वत के हिम मंडित शिखरों को छूती है, तो वहाँ का नजारा किसी दिव्य लोक जैसा प्रतीत होता है। चांदी की तरह चमकती बर्फ देखते ही देखते कुंदन की तरह दमकने लगती है, मानो देवताओं ने भगवान शिव के राज्याभिषेक के लिए सुवर्ण की वर्षा कर दी हो। बर्फ से ढकी ये चोटियाँ ऐसी लगती हैं मानो स्वयं सदाशिव अपनी समाधि में लीन हों और उनके पूरे विग्रह पर कर्पूर जैसी धवल भस्म लिपटी हुई हो। पुराणों में वर्णित है कि इस पर्वत के आस-पास का आकाश साक्षात् देवराज इंद्र, वरुण और वायुदेव की क्रीड़ास्थली है। पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब महादेव और माता पार्वती कैलाश में विराजमान होते थे, तब समस्त तैंतीस कोटि देवी-देवता, यक्ष, गंधर्व और अप्सराएं इसी घाटी में आकर स्तुति गान करते थे। आज भी इस घाटी में बहने वाली हवाओं में एक खास तरह की झंकार और रहस्यमयी शांति महसूस होती है। यह पर्वत केवल एक धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि एक ऐसा रहस्य है जो विज्ञान और अध्यात्म को एक बिंदु पर लाकर खड़ा कर देता है। सदियों से साधक, योगी और तीर्थयात्री इन हिम शिखरों की ओर खिंचे चले आते हैं, क्योंकि इसके दर्शन मात्र से मन को असीम शांति, इंसानी दुनिया के तमाम संशयों से मुक्ति और आत्मा को मोक्ष का मार्ग प्राप्त होता है।
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