शिव पुराण और लिंग पुराण के अनुसार, द्वापर युग के अंत और कलयुग के प्रारंभ की उस भयावह संधि-वेला में जब अज्ञान और पाश (माया के बंधन) चरम पर पहुँचने वाले थे, तब भगवान शिव ने अपने अट्ठाईसवें एवं अंतिम अवतार के रूप में लकुलेश्वर (लकुलीश) का रूप धारण किया।
इस अवतरण का सबसे बड़ा रहस्य ‘कायावरोहण’ की प्रक्रिया में छिपा है। संस्कृत में ‘काया’ का अर्थ शरीर और ‘अवरोहण’ का अर्थ नीचे उतरना या प्रवेश करना होता है। पुराणों के अनुसार, भगवान शिव ने अपनी योग माया से अपनी संपूर्ण चेतना और दिव्य ऊर्जा को एक काया में पिरोया और पृथ्वी पर अवतरित हुए।
यह केवल एक साधारण अवतार नहीं था, बल्कि कलयुग की काली छाया में भटकती हुई आत्माओं को माया रूपी ‘पशु-भाव’ से मुक्त करके परमेश्वर (‘पति’) में लीन करने का एक अति-गुप्त योग-मार्ग था। उनके हाथ का ‘लकुट’ (डंडा) केवल एक लाठी नहीं, बल्कि संयम, आत्म-नियंत्रण और अज्ञान के बंधनों को एक ही प्रहार में काट देने वाले परम पाशुपत ज्ञान का प्रतीक है।
पुराणों पर आधारित कथा
द्वापर युग का सूर्य धीरे-धीरे अस्त हो रहा था। चारों ओर एक अज्ञात भय और कलयुग के आगमन की आहट से संपूर्ण सृष्टि कांप रही थी। धर्म के स्तंभ ढीले पड़ रहे थे और ऋषि-मुनि चिंतित थे कि आने वाले अंधकार युग में मनुष्य मुक्ति का मार्ग कैसे खोजेगा।
तभी गुजरात के पावन कायावरोहण क्षेत्र में एक अमावस्या की नीरव रात्रि में श्मशान की शांत भूमि से एक अलौकिक नीली ज्योति प्रकट हुई। वायुमंडल में एक ऐसी सूक्ष्म ध्वनि गूंजने लगी जिसे कानों से नहीं, आत्मा से अनुभव किया जा सकता था। भोर होते ही वहाँ एक नवजात दिव्य ब्रह्मचारी दृष्टिगोचर हुआ, जिसके एक हाथ में छोटा सा डंडा (लकुट) और दूसरे हाथ में बीजोरा फल था।
बालक के मुख मंडल पर असीम शांति थी, किंतु बंद नेत्रों के भीतर कलयुग के अंधकार को भस्म कर देने वाली प्रचंड अग्नि समाहित थी। लोग चकित थे कि यह बालक कौन है और इसके हाथ का यह डंडा किस गुप्त शक्ति का संकेत है?
जब ध्यान साधकों ने अपनी योग-दृष्टि से देखा तो रहस्य उजागर हुआ—स्वयं देवाधिदेव महादेव कलयुग से पूर्व ही जीवों के उद्धार का मार्ग सुरक्षित करने के लिए लकुलेश्वर के रूप में अवतरित हुए थे। भगवान लकुलेश्वर ने अपने चार परम ऋषियों—कुशिक, गर्ग, मित्र और कौरुष्य को पाशुपत योग का वह गुप्त ज्ञान दिया, जिसने युगों-युगों तक भारत भूमि को आध्यात्म का प्रकाश दिया।
लकुलेश्वर महादेव के प्रमुख मंदिर एवं ऐतिहासिक केंद्र
1. कायावरोहण मंदिर (वडोदरा, गुजरात):
यह भगवान लकुलीश का मुख्य प्राकट्य स्थल और पाशुपत संप्रदाय की मूल पीठ है। यहाँ स्थापित भव्य शिवलिंग के पृष्ठभाग पर भगवान लकुलीश की दिव्य प्रतिमा उकेरी गई है, जो ध्यान मुद्रा में विराजमान है।
2. एकलिंगजी मंदिर परिसर (उदयपुर, राजस्थान):
मेवाड़ के आराध्य देव एकलिंगजी मंदिर परिसर में दसवीं शताब्दी का प्रसिद्ध और अत्यंत कलात्मक लकुलीश मंदिर स्थित है। यह स्थान प्राचीन काल में पाशुपत साधुओं की महान साधना स्थली रहा है।
3. जागेश्वर धाम एवं कुमाऊँ क्षेत्र (उत्तराखंड):
हिमालय के आँचल में स्थित जागेश्वर मंदिर समूह और आसपास के प्राचीन शैव स्थलों पर लकुलेश्वर परंपरा का गहरा प्रभाव रहा है। यहाँ की प्राचीन मूर्तियों और अभिलेखों में हाथ में लकुट लिए योग मुद्रा में विराजमान लकुलीश भगवान के रूप देखे जा सकते हैं।
4. परशुरामेश्वर एवं मुक्तेश्वर मंदिर (भुवनेश्वर, ओडिशा):
पूर्वी भारत में भुवनेश्वर की प्राचीन स्थापत्य कला में लकुलेश्वर महादेव का महत्वपूर्ण स्थान है। परशुरामेश्वर मंदिर की बाहरी दीवारों पर लकुलीश को अपने चार शिष्यों के साथ साधना करते हुए दर्शाया गया है।
5. बादामी और महाकूट मंदिर (कर्नाटक):
दक्षिण भारत की चालुक्यकालीन बादामी की गुफाओं और महाकूट मंदिर परिसरों में लकुलेश्वर महादेव के प्राचीन शिल्प विद्यमान हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि प्राचीन काल में लकुलीश परंपरा का प्रभाव उत्तर भारत से लेकर दक्षिण भारत तक संपूर्ण आर्यावर्त में फैला हुआ था।
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