रहस्यमय हिमालय की चोटी पर सती का वह अंग और शिव का महाविलाप: जानिए सिद्धपीठ कुंजापुरी का अलौकिक सत्य

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विशेष आलेख: देवभूमि की रहस्यमयी आध्यात्मिक गाथा

समुद्र तल से 1,676 मीटर की अगाध ऊँचाई पर बादलों के पार एक ऐसा शिखर है, जहाँ पहुँचते ही हवाओं में किसी दिव्य रहस्य की उपस्थिति का आभास होता है। यह शिखर केवल प्रकृति के सम्मोहन का केंद्र नहीं है, बल्कि उस प्रलयंकारी गाथा का गवाह है जब स्वयं महाकाल भगवान शिव वैराग्य और वियोग की चरम सीमा में तांडव करने लगे थे। यह पावन स्थल है—कुंजापुरी सिद्धपीठ।

यहाँ की चोटियों से जब भोर की पहली किरण फूटती है, तो हिमालय की स्वर्गारोहणी, गंगोत्री, बंदरपूँछ और चौखंबा जैसी गगनचुंबी हिमाच्छादित चोटियाँ सोने की भांति चमक उठती हैं। वहीं दक्षिण की ओर दृष्टि डालें तो ऋषिकेश, हरिद्वार और सुरम्य दूनघाटी का विहंगम दृश्य मन को किसी अन्य लोक की अनुभूति कराता है। टिहरी जिले में नरेंद्र नगर से मात्र 7 किमी, ऋषिकेश से 15 किमी और देवप्रयाग से 93 किमी की दूरी पर स्थित यह शक्तिपीठ न केवल आस्था, बल्कि ब्रह्मांडीय ऊर्जा का अद्वितीय केंद्र है।

जब महादेव के क्रोधाग्नि से थर्रा उठा ब्रह्मांड

इस सिद्धपीठ की उत्पत्ति का रहस्य त्रेता युग के उस भयानक प्रसंग से जुड़ा है, जिसने संपूर्ण सृष्टि को हिलाकर रख दिया था। स्कंदपुराण के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा कनखल में आयोजित विशाल महायज्ञ में भगवान शिव को आमंत्रित नहीं किया गया था। अपने परम पूज्य पति का यह घोर अपमान देवी सती सहन न कर सकीं और उन्होंने उसी यज्ञवेदी के अग्निकुंड में अपने प्राणों की आहुति दे दी।

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जब यह समाचार देवाधिदेव महादेव तक पहुँचा, तो उनका तीसरा नेत्र खुल गया। क्रोधित शिव ने अपनी जटा से वीरभद्र और गणों को उत्पन्न कर दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करवा दिया और दक्ष का सिर कटवा दिया। कालांतर में देवताओं की याचना पर दक्ष के धड़ पर बकरे का सिर लगाकर यज्ञ पूर्ण हुआ, किंतु शिव का शोक शांत न हुआ।

सती के भस्म शरीर को अपनी बाहों में उठाकर महादेव हिमालय के दुर्गम शिखरों पर विरहाकुल होकर भटकने लगे। उनके इस महाविलाप और वियोग की मार्मिक दशा का वर्णन स्कंदपुराण के केदारखण्ड (अध्याय 141) में मिलता है:

अत्र पूर्वं महारुद्रो रुरोद विरहातुरः। देव्याः कलेवरोत्सर्गे स्मृत्वा तन्मुखचन्द्रकम्॥ (अर्थात्: देवी सती के पार्थिव शरीर त्याग के पश्चात उनके चंद्रमुख का स्मरण करते हुए महारुद्र शिव विरह से आतुर होकर फूट-फूट कर रोने लगे थे।)

सुदर्शन चक्र का प्रहार और ‘कुञ्जकूट’ का प्राकट्य

महादेव के इस प्रचंड वियोग और प्रलयकारी स्थिति को देखकर संपूर्ण देवगण भयभीत हो उठे। समस्त लोकों की रक्षा के निमित्त भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के निष्प्राण देह को 52 भागों में विच्छेदित कर दिया। देवी के अंग जिस-जिस पर्वत और भूभाग पर गिरे, वे स्थान परम ‘शक्तिपीठ’ बन गए।

मान्यता है कि इस दिव्य पर्वत शिखर पर देवी सती के शरीर का ऊपरी भाग (कुंज/वक्षस्थल) गिरा था, जिसके कारण इस पावन चोटी को ‘कुंजापुरी’ नाम से जाना गया।

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स्कंदपुराण (केदारखण्ड, अध्याय 140) में इस शिखर का उल्लेख ‘कुञ्जकूट’ के रूप में करते हुए इसकी सिद्धि-दायिनी महिमा का साक्षात प्रमाण दिया गया है:

तस्मादुत्तरभागे हि कुञ्जकूट इति स्मृतः। तत्र वै संस्थिता बाला सर्वसिद्धिप्रदायिनी॥ धन्यानां गोचरा सा स्यान्माणिक्याभा महेश्वरी। तत्र यस्त्रिदिनं बाला मन्त्रराजं जपेन्नरः। प्राप्नोति परमां सिद्धिं महादेव्याः प्रसादतः॥ (अर्थात्: उसके उत्तर भाग में ‘कुञ्जकूट’ नामक प्रसिद्ध स्थान है, जहाँ सर्वसिद्धि प्रदायिनी माता बाला त्रिपुर सुंदरी विराजती हैं। माणिक्य के समान प्रभा वाली उन महेश्वरी के दर्शन अत्यंत भाग्यवानों को ही होते हैं। जो मनुष्य वहाँ तीन दिन तक ‘बाला मंत्रराज’ का जप करता है, वह महादेवी की कृपा से परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है।)

केदारखण्ड के अध्याय 140 के अनुसार, नरेंद्र नगर के उत्तर में स्थित इस कुंजापुरी शिखर पर शक्तिस्वरूपा काली का जाग्रत सिद्धपीठ विद्यमान है।

टिहरी का दिव्य ‘शक्ति-त्रिकोण’

आदिशंकराचार्य द्वारा शिवालिक पर्वतमाला में स्थापित व मान्यता प्राप्त पीठों में कुंजापुरी का स्थान अत्यंत विशिष्ट है। टिहरी गढ़वाल की धरती पर तीन प्रमुख शक्तिपीठ मिलकर एक अत्यंत रहस्यमयी और अभेद्य ‘पवित्र शक्ति-त्रिकोण’ का निर्माण करते हैं:

  1. कुंजापुरी देवी: जहाँ देवी का वक्ष/कुंज भाग गिरा।
  2. सुरकंडा देवी (सुरकूट शिखर): जहाँ देवी की गर्दन (मस्तिष्क/सिर का भाग) गिरा।
  3. चंद्रबदनी देवी (चंद्रकूट शिखर): जहाँ देवी का धड़/वदन भाग गिरा।

यह त्रिकोण संपूर्ण हिमालयी क्षेत्र में सकारात्मक आध्यात्मिक ऊर्जा का एक ऐसा सुरक्षा चक्र बनाता है, जिसकी वंदना स्वयं देवगण इस श्लोक के साथ करते हैं:

प्रकृत्यै ते नमस्तेऽस्तु भिन्नायै पुरुषान्नमहः। सृष्टिकर्त्र्यै सृष्टिहर्त्र्यै देव्यै तस्यै नमोनमः॥ (अर्थात्: हे मूल प्रकृति देवी! आपको नमस्कार है। सृष्टि का निर्माण और संहार करने वाली जगदम्बा को बारंबार नमन है।)

साहसिक ट्रेक, सूर्योदय का सम्मोहन और साधना

यदि आप मात्र एक साधारण दर्शनार्थी नहीं, बल्कि रोमांच और शांति के खोजी हैं, तो चंबा मार्ग पर स्थित हिंडोलाखाल से घने, शांत बांज-बुरांश के वनों के बीच से होकर गुजरने वाला 5 किमी का पैदल ट्रेक आपको एक स्वप्निल संसार में ले जाता है।

  • दर्शन का समय: मंदिर के कपाट प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक खुले रहते हैं।
  • सर्वश्रेष्ठ समय: कुंजापुरी के दर्शन वर्ष पर्यंत किए जा सकते हैं, परंतु शारदीय एवं चैत्र नवरात्र के दौरान यहाँ देश-विदेश से आने वाले साधकों और श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ता है।
  • अनुभूति: मंदिर प्रांगण से प्रातःकालीन सूर्योदय और संध्याकालीन सूर्यास्त का दृश्य जीवन का अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है। दर्शन के पश्चात स्थानीय ढाबों पर गरमा-गरम चाय की चुस्कियों के साथ हिमालय की बर्फीली हवाओं का आनंद लेना आत्मा को तृप्त कर देता है।
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कुंजापुरी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि प्रकृति और पराशक्ति के मिलन का वह दुर्लभ शिखर है जहाँ आकर मन स्वतः ही शांत और नतमस्तक हो जाता है।

@ रमाकान्त पन्त @

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