आखिर देवदार के घने जंगलों में छिपा वो कौन सा रहस्यमयी महासत्य है जिससे कांप उठी थी पूरी पृथ्वी? जानिए शिवभक्त भरत पाण्डे के अलौकिक विचार

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उत्तराखंड के सुरम्य जनपद अल्मोड़ा में जटागंगा के पावन तट पर गगनचुंबी प्राचीन देवदार के वृक्षों के बीच बसा जागेश्वर धाम केवल एक तीर्थस्थल नहीं, बल्कि ब्रह्मांड के सबसे बड़े अलौकिक रहस्य और शिव के परम वैराग्य की गवाही देता है। आखिर क्यों इस पावन ‘दारुकवन’ में गिरे एक तेजोमय विशाल लिंग के ताप से धरती रसातल में धंसने लगी थी? क्यों भगवान श्री हरि विष्णु को अपना अमोग सुदर्शन चक्र चलाना पड़ा था?
सती-विरह से जन्मा प्रलयकारी वैराग्य
इस अलौकिक इतिहास की शुरुआत प्रजापति दक्ष के उस यज्ञ से हुई, जहाँ माता सती ने अपने स्वामी भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर यज्ञ वेदी की योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। सती के देहत्याग का समाचार मिलते ही भूतभावन महादेव का क्रोध प्रलयंकर रूप धारण कर गया। उन्होंने सर्वस्व त्याग कर परम वैराग्य अपना लिया। बाघांबर धारण किए, शरीर पर भस्म रमाए और हाथों में कपाल लिए भगवान शिव हिमालय के सघन ‘दारुकवन’ (वर्तमान जागेश्वर धाम) पहुँचे और गहन ध्यान-तपस्या में लीन हो गए।
ऋषियों का अज्ञानतापूर्ण शाप और महालिंग का प्राकट्य
दारुकवन में महर्षि वसिष्ठ आदि अनेक ज्ञानी ऋषि अपने परिवारों के साथ रहते थे। एक दिन ऋषियों की पत्नियां वन में समिधा एकत्र करने गईं, जहाँ उनकी दृष्टि परम शांति में लीन अवधूत रूपधारी भगवान शिव पर पड़ी। महादेव के अलौकिक तेज से सम्मोहित होकर वे अपनी सुध-बुध खो बैठीं। जब संध्या तक वे आश्रम नहीं लौटीं, तो क्रुद्ध ऋषियों ने अज्ञानतावश महादेव को साधारण मनुष्य समझकर शाप दे दिया कि उनका लिंग कटकर पृथ्वी पर गिर पड़े।
निरपराध महादेव ने मुनियों के वचनों का मान रखते हुए उस शाप को सहर्ष स्वीकार किया। किंतु जैसे ही वह तेजोमय विशाल लिंग पृथ्वी पर गिरा, वह कोई साधारण पाषाण नहीं बल्कि अनंत ऊर्जा का महालिंग बनकर सातों पातालों से लेकर अनंत आकाश तक फैल गया।
सुदर्शन चक्र का प्रहार और ज्योतिर्लिंगों की स्थापना
उस महालिंग के असीम ताप और भार से संपूर्ण पृथ्वी थरथराने लगी और रसातल में धंसने लगी। ब्रह्मा और विष्णु जी भी उस अनंत महालिंग का आदि और अंत पाने में असफल रहे। अंततः समस्त देवों और पृथ्वी माता की प्रार्थना पर करुणासागर शिव प्रसन्न हुए। उन्होंने भगवान विष्णु को अपने सुदर्शन चक्र से उस अनंत महालिंग को विभाजित करने की आज्ञा दी। विष्णु जी के चक्र प्रहार से वह अनंत महालिंग करोड़ों टुकड़ों में विभक्त होकर नवखंडों में स्थापित हुआ, जिन्हें आज संसार भर में पवित्र शिवलिंगों और ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है।
भगवान शिव के परम भक्त भरत पाण्डे के विचार
भगवान शिव के अनन्य एवं आस्थावान भक्त गौलापार निवासी सेंचुरी मिल के सहायक प्रबंधक डा० भरत पाण्डे का मानना है कि जागेश्वर धाम केवल पत्थरों की प्राचीन नक्काशी या प्राकृतिक सुंदरता का केंद्र नहीं है, बल्कि यह वह पावन तपोभूमि है जहाँ महादेव के विरह से ब्रह्मांडीय कल्याण का मार्ग प्रशस्त हुआ।
शिवभक्त भरत पाण्डे जी कहते हैं:
“जागेश्वर धाम की पवित्र धारा में महादेव का वैराग्य और उनकी असीम करुणा आज भी बहती है। सती के विरह से उपजा यह वैराग्य अंततः ऋषियों के अज्ञान को दूर कर संपूर्ण ब्रह्मांड के कल्याण का आधार बना। जब-जब मनुष्य अहंकार और अज्ञान में डूबता है, उसे जागेश्वर धाम की शरण में आकर यह समझना चाहिए कि ईश्वर किसी बाह्य आडंबर से नहीं, बल्कि केवल निष्कपट भाव से प्रसन्न होते हैं। यह पावन भूमि संपूर्ण विश्व में शिवलिंगों के प्राकट्य की प्रथम भूमि है, जहाँ से समूचे ब्रह्मांड को शिव-तत्व की दिव्य ऊर्जा प्राप्त हुई।”
इस प्रकार, सती का विरह, शिव का वैराग्य और ऋषियों का शाप मिलकर जागेश्वर धाम को संपूर्ण ब्रह्मांड में प्रथम ज्योतिर्लिंग के अवतरण की परम पावन भूमि बनाते हैं।

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