सनातन संस्कृति में जीवन का प्रत्येक क्षण किसी न किसी गूढ़ भाव, आध्यात्मिक विज्ञान और उच्च उद्देश्य से स्पंदित है। परंतु आज के आधुनिक दौर में हम प्रायः हर अवसर को एक ही तराजू में तौलने की भूल कर बैठते हैं, चाहे वह जन्म की पावन तिथि हो या विवाह की वर्षगांठ। यदि हम ऋषियों की सूक्ष्म दृष्टि और वैदिक परंपरा के अंतःस्थल में उतरें, तो स्पष्ट होता है कि जन्मदिन जहाँ जीवन-चेतना का आनंदोत्सव है, वहीं वैवाहिक वर्षगांठ तड़क-भड़क से दूर रखकर संयम, साधना और आत्म-मंथन करने की एक पवित्र वेला है।
जन्मदिन क्यों मनाना चाहिए? (शास्त्रों का प्रकाश)
शास्त्रों की स्पष्ट घोषणा है— ‘दुर्लभं मानुषं जन्म’। अनेक योनियों के भ्रमण के उपरांत प्राप्त यह मानव देह ईश्वर का सर्वोत्कृष्ट उपहार है, जिसके माध्यम से जीव धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के परम लक्ष्य को प्राप्त करता है। अतः जन्मदिन केवल आयु का एक वर्ष घट जाने का दिन नहीं, अपितु इस दिव्य शरीर और जीवन-दीप के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने का मंगल पर्व है।
गोस्वामी तुलसीदास जी ने श्रीरामचरितमानस के बालकांड में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम के जन्मोत्सव का वर्णन करते हुए अत्यंत मधुर शैली में लिखा है:
नवमी तिथि मधुमास पुनीता। सुकल पच्छ अभिजित हरिप्रीता॥
मध्य दिवस अति सीत न घामा। पावन काल लोक विश्रामा॥
भए प्रगट कृपाला दीनदयाला कौसल्या हितकारी।
हरषित महतारी मुनि मन हारी अद्भुत रूप बिचारी॥
जन्मोत्सव पर होने वाले मंगल आचरण, दान-पुण्य और उल्लास की महत्ता बताते हुए वे आगे कहते हैं:
देहिं दान बिप्रन्ह कहुं नाना। जाचक दिए अमित परिधाना॥
ध्वज पताका तोरण पुर छाए। सब बिधि मंगल कलश सजाए॥
मानस का यह प्रसंग स्पष्ट करता है कि जन्मदिन अंधकार मिटाने के लिए दीप प्रज्वलित करने का दिन है, न कि मोमबत्तियाँ बुझाकर प्रकाश को बुझाने का। इस दिन दान-पुण्य, मंगल आचरण और ईश्वर-वंदना का विधान है।
स्कंद पुराण एवं भविष्य पुराण में भी जन्मदिन पर अष्ट-चिरंजीवियों का स्मरण तथा मार्कंडेय पूजन का विशेष विधान बताया गया है:
अश्वत्थामा बलिर्व्यासो हनुमानं च विभीषणः।
कृपाचार्यश्च परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः॥
सप्तैतान् संस्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमथाष्टमम्।
जीवेद्वर्षशतं प्राज्ञः सर्वव्याधिविवर्जितः॥
अर्थात इस दिन अष्ट-चिरंजीवियों का ध्यान कर कुलदेवता, गुरु और माता-पिता का पूजन कर आशीर्वाद प्राप्त करना चाहिए। यह दिन आयुष्य होम (आरोग्य यज्ञ), दीप-दान और जीव-सेवा के साथ जीवन रूपी चेतना का सत्कार करने का पावन अवसर है।
वैवाहिक वर्षगांठ पर शास्त्रों की गूढ़ दृष्टि
इसके सर्वथा विपरीत, सनातन परंपरा में विवाह कोई लौकिक समझौता या मात्र मनोरंजन का साधन नहीं, अपितु दो आत्माओं को गृहस्थ धर्म में प्रवेश कराने वाला अत्यंत पवित्र ‘संस्कार’ है। ऋग्वेद के विवाह सूक्त (१०.८५.३६) में पाणिग्रहण की अमर प्रतिज्ञा का उल्लेख करते हुए कहा गया है:
गृभ्णामि ते सौभगत्वाय हस्तं मया पत्या जरदष्टिर्यथासः।
भगो अर्यमा सविता पुरंधिर्मह्यं त्वादुर्गार्हपत्याय देवाः॥
अर्थात, सौभाग्य और परम कल्याण हेतु पति-पत्नी एक-दूसरे का हाथ थामते हैं ताकि जीवन के अंतिम पड़ाव तक संयमपूर्वक गृहस्थ धर्म का निर्वहन कर सकें। शतपथ ब्राह्मण में पत्नी को ‘अर्धांगिनी’ और ‘सहधर्मचारिणी’ कहते हुए लिखा गया है— ‘अर्धो वा एष आत्मनो यज्जाया’, अर्थात पत्नी के बिना पुरुष का आध्यात्मिक और धार्मिक जीवन अपूर्ण है।
श्रीरामचरितमानस में भी प्रभु श्री राम और जगज्जननी माता सीता के दांपत्य को गृहस्थ जीवन का सर्वोत्कृष्ट मानक मानते हुए तुलसीदास जी लिखते हैं:
राम सीय जस जोरी बनी। बिधि बस उपजी त्रिभवन गुनी॥
परंतु शास्त्र विधान के अनुसार, विवाह की वार्षिक तिथि किसी भारी-भरकम पार्टी, शोर-शराबे, कोलाहल या भौतिक प्रदर्शन का अवसर नहीं है। यह तो उस पवित्र संकल्प दिवस का स्मरण कराने वाली एक गंभीर साधना तिथि है। अग्नि को साक्षी मानकर जो सात वचन (सप्तपदी) लिए गए थे, वर्षगांठ के दिन पति-पत्नी को एकांत में, शांत चित्त से बैठकर उन्हीं वचनों के पुनरीक्षण की आवश्यकता होती है।
जैसे-जैसे विवाह के वर्ष बीतते हैं, गृहस्थ जीवन में उतनी ही अधिक परिपक्वता, गंभीरता और संयम का समावेश होना चाहिए। यदि इस दिन को तड़क-भड़क और अति-उल्लास में गंवा दिया जाए, तो यह उस पवित्र संस्कार के मूल भाव ‘संयम’ को आघात पहुँचाता है। अतः इस तिथि पर कोलाहल के स्थान पर संयुक्त रूप से देव-पूजन, अग्नि-साक्षी हवन और यह आत्म-मंथन करना चाहिए कि दोनों एक-दूसरे के नैतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान में कितने सहायक सिद्ध हुए हैं।
विशेष
संक्षेप में कहें तो, जन्मदिन जीवन रूपी दीपक को प्रज्वलित कर ईश्वर के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का उल्लासमय पर्व है; जबकि वैवाहिक वर्षगांठ गृहस्थ धर्म के उत्तरदायित्वों, संयम, साधना और आत्म-समीक्षा का स्मरण कराने वाला एक गंभीर संकल्प दिवस है। जब हम शास्त्रों की इस मर्यादा और वैज्ञानिकता को समझकर जीवन पथ पर आगे बढ़ते हैं, तब हमारे परिवार और समाज में शांति, मिठास और अक्षय संतुलन की स्थापना होती है।
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