दमयन्ती-ताल (कुमाऊँ, देवभूमि उत्तराखण्ड)। देवभूमि उत्तराखण्ड के रमणीक कुमाऊँ अंचल में, नैनीताल जिले के भीमताल से मात्र दो-तीन किलोमीटर की दूरी पर सघन बाँझ, बांज और चीड़-देवदारु के वनों के बीच बसा ‘सप्तताल’ का शांत क्षेत्र प्रकृति का एक अलौकिक विस्मय समेटे हुए है। वर्तमान में भौगोलिक और प्रशासनिक दृष्टि से जिसे श्रद्धालु और पर्यटक ‘नल-दमयंती ताल’ के एक संयुक्त प्राकृतिक जल-सरोवर के रूप में जानते हैं, उसके भीतर छिपा आध्यात्मिक रहस्य सदियों पुराना है। पौराणिक ग्रंथों और स्कन्दपुराण के ‘मानसखण्ड’ में जहाँ इन सरोवरों की उत्पत्ति और माहात्म्य का पृथक-पृथक व स्वतंत्र वर्णन मिलता है, वहीं धरातल पर समय के प्रवाह के साथ यह पावन स्थल राजा नल और महारानी दमयंती के अटूट प्रेम और साधना के प्रतीक स्वरूप एक ही दिव्य सरोवर में समाहित होकर लोकप्रसिद्ध हो गया है।
नीलवर्णी दर्पण-सा जल और दमयन्ती-ताल का अलौकिक वैभव
हरी-भरी उपत्यकाओं की गोद में स्थित इस पंचकोणीय सरोवर का गहरा, पारदर्शी और शांत नीर किसी ऋषि की समाधि-सा प्रतीत होता है। चारों ओर दुर्लभ पक्षियों का मधुर कलरव और शीतल मन्द पवन वातावरण में एक सम्मोहन घोलती है। स्कन्दपुराण के मानसखण्ड (अड़तालीसवें अध्याय) में वर्णित है कि महारानी दमयंती ने अपने वनवास काल के दौरान प्रातःकालीन स्नान, ध्यान एवं नियम-व्रत की सिद्धि हेतु इस शांत सरोवर का निर्माण कराया था। आगे चलकर जब महर्षियों ने इसकी पावनता और दमयंती की निष्काम भक्ति को देखा, तो उन्होंने पवित्र ‘भद्रा’ नदी के अमृतमयी जल से इसे परिपूर्ण कर दिया।
महर्षि वेदव्यास जी के अनुसार, इस पवित्र जल में एक बार भी आस्था की डुबकी लगाने वाले पुण्यात्मा को तीर्थराज प्रयाग में त्रिवेणी-स्नान के समान महापुण्य प्राप्त होता है और वह ब्रह्मपद की प्राप्ति का अधिकारी बन जाता है। इस पावन जल की दिव्यता का स्मरण करते हुए ऋषिगण जल-अर्चन में लीन हो जाते हैं:
गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
सिद्धों की तपोस्थली और अमरावती का द्वार: ‘सिद्धसर’
दमयन्ती-ताल से संलग्न इसी वन-प्रांतर में थोड़ा आगे बढ़ने पर एक अनिर्वचनीय शांति और अलौकिक सुगंध मन को बाँध लेती है। यह वही पावन भूभाग है जहाँ चित्रक आदि प्रमुख सिद्ध तपोधनों ने अपनी कठोर साधना से सिद्धसर का सृजन किया था। यहाँ का दृश्य मन मोह लेने वाला है—सरोवर के तट पर प्यास बुझाते निर्दोष वन-मृग, तटों पर विचरण करती सिद्ध-कन्याएँ और वृक्षों की छांव में ध्यानस्थ मुनिजन। देवराज इन्द्र द्वारा बरसाए गए मेघ-जल से भरे इस सरोवर के किनारे गंधर्वों और विद्याधरों ने भी दिव्य संगीत के साथ तपस्या की थी। मान्यता है कि इस पावन नीर में स्नान करने से प्राणी को पुण्यसलिला सरयू के स्नान का फल प्राप्त होता है और वह सीधे देवराज इन्द्र के दिव्य धाम ‘अमरावती’ की यात्रा पर अग्रसर हो जाता है।
शिवगणों द्वारा सिंचित सरोवर और यम-भय का अंत
किंतु इस घाटी का सबसे बड़ा रोमांच पचासवें अध्याय में वर्णित उस अज्ञात, परम शिवभक्त तपस्वी की निष्काम साधना में झलकता है। गहन अरण्य के मध्य जब उस तपस्वी ने देवाधिदेव महादेव की आराधना करते हुए एक पुण्य सरोवर का निर्माण किया, तो स्वयं भगवान आशुतोष के आदेश पर उनके गणों ने दिव्य जल लाकर इस सरोवर को भर दिया। जब उस तपस्वी ने अपने प्रफुल्लित नेत्रों से उस सरोवर के तट पर भगवान शिव का अर्चन किया, तो काल भी नतमस्तक हो गया और देहावसान के उपरांत वह सीधे शिवपुर को प्रस्थान कर गया।
इस सरोवर का प्रभाव इतना अचूक बताया गया है कि जो मनुष्य केवल इसके समीप भी चला जाता है, उसके जीवन से यमलोक का भय सदा-सदा के लिए समाप्त हो जाता है। विधिवत स्नान कर देवाधिदेव का अर्चन करने वाले साधक के लिए शिवलोक के द्वार स्वतः खुल जाते हैं। देवाधिदेव की इसी परम कृपा का गान करते हुए भक्त हृदय से यह मन्त्र प्रस्फुटित होता है:
ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च। नमः शिवाय च शिवतराय च॥
महर्षि वेदव्यास जी बताते हैं कि मानसखण्ड के इन ‘सप्तह्रदों’ (सात पवित्र सरोवरों) का माहात्म्य केवल कानों से सुन लेने मात्र से ही जीवात्मा को परम गति प्राप्त हो जाती है। आज भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह स्थल एक शांत ‘नल-दमयंती ताल’ के रूप में दिखाई देता हो, किंतु इसके कण-कण और पावन नीर में पुराणों के अलग-अलग अध्यायों में वर्णित ऋषियों, सिद्धों और स्वयं शिवगणों की दिव्य ऊर्जा आज भी उसी प्रकार जीवंत महसूस होती है।
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