अर्जुन के बाण और महादेव के चरण से फूटी थी मानसरोवर की गुप्त धारा? जानिए कूर्मांचल के उस रहस्यमयी धाम का सच, जहाँ पिंडदान से तर जाती हैं सौ पीढ़ियां!
विशेष रिपोर्ट: रमाकान्त पन्त, चम्पावत
देवभूमि उत्तराखंड की सुरम्य वादियों में एक ऐसा रहस्यमयी तीर्थ स्थित है, जिसके कण-कण में अलौकिक ऊर्जा और रहस्यों का वास है। चम्पावत जनपद मुख्यालय से लगभग 8 किलोमीटर दूर, पिथौरागढ़-चम्पावत मोटर मार्ग से मात्र सवा किलोमीटर की दूरी पर स्थित ‘मानेश्वर महादेव मंदिर’ आज भी श्रद्धालुओं के लिए अगाध श्रद्धा, आश्चर्य और आध्यात्मिक शांति का केंद्र बना हुआ है। नैसर्गिक सौंदर्य से आच्छादित यह वही पावन धरा है, जहाँ पहुँचते ही भक्तों को दिव्य अनुभूतियाँ होने लगती हैं।
ब्रह्माजी के मानस संकल्प से प्रकट हुआ यह धाम
स्कन्दपुराण के मानसखण्ड अंतर्गत 65वें अध्याय ‘मानसेश्वर-माहात्म्य’ में महर्षि वेदव्यास जी ने इस पवित्र तीर्थ के प्राकट्य का रहस्य उजागर किया है। पुराणों के अनुसार, कूर्मांचल पर्वतमाला के मध्य में स्थित ‘मानसेय’ पर्वत के शिखर पर विराजमान मानसेश्वर महादेव भक्तों को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करते हैं:
मानसेयेति विख्यातो मध्ये कूर्माचलस्य हि। पर्वतो मुनिशार्दूला विद्याधरनिषेवितः ॥ शिखरे तस्य वै विप्रा मानसेशो हरः स्मृतः। स तु भुक्तिप्रदो विप्राः सैव मुक्तिप्रदः स्मृतः ॥
अर्थ: कूर्माचल के मध्य में विद्याधरों द्वारा सेवित मानसेय नामक विख्यात पर्वत है। हे मुनिश्रेष्ठों! उसके शिखर पर मानसेश्वर महादेव विराजमान हैं, जो भक्तों को समस्त सांसारिक भोग और परम मोक्ष प्रदान करने वाले हैं।
जब देवाधिदेव ने अपने श्रीचरण से दिखाई मानसरोवर की सीमा
इस धाम से जुड़ा सबसे बड़ा रहस्य यह है कि तिब्बत में स्थित पवित्र मानसरोवर का गहरा संबंध इसी कूर्मांचल शिखर से है। पौराणिक आख्यान के अनुसार, सत्ययुग के आरंभ में भगवान शिव के प्रमुख गण निकुम्भ ने घोर तपस्या की। जब निकुम्भ ने नदियों के उद्गम और मानसरोवर की अंतिम सीमा के विषय में पूछा, तब देवाधिदेव महादेव ने कूर्मांचल पर्वत के शिखर पर अपने श्रीचरण से मानसरोवर के पावन जल को साक्षात प्रकट कर दिया:
शिव उवाच— यावत् तोयं हिमाद्रौ वै सम्भूतं गणनायक। तावन्मानससम्भूतं जानीहि गणनायक ॥
अर्थ: भगवान शिव ने कहा—हे गणनायक! हिमालय में जितना भी पवित्र जल प्रवाहित होता है, उसे मानसरोवर से ही उद्भूत जानो। इस रहस्य को जानकर और सरोवर के अंत दर्शन कर निकुम्भ परम पद को प्राप्त हुए।
अर्जुन के बाण और पाण्डवों के पितृ तर्पण की अनूठी गाथा
महाभारत कालीन इतिहास भी इस तीर्थ की महिमा का साक्ष्य देता है। अपने वनवास काल एवं मानस क्षेत्र भ्रमण के दौरान पाण्डव अपनी माता कुंती की इच्छा पूर्ण करने के लिए हिमालय की ओर अग्रसर हुए। माता कुंती का संकल्प था कि उनके दिवंगत पति महाराज पाण्डु का श्राद्ध मानसरोवर के पावन जल से ही संपन्न हो।
मार्ग में जब श्राद्ध की तिथि आ पहुँची, तब पाण्डव इसी कूर्मांचल के मानेश्वर क्षेत्र में थे। माता के संकल्प को तत्काल पूरा करने के लिए धनुर्धर अर्जुन ने अपने दिव्य बाण से धरती का सीना चीरकर मानसरोवर की अंतर्धारा को यहीं प्रकट कर दिया। इसके बाद पाण्डवों ने भगवान मानेश्वर की साक्षी में उसी पावन जल से अपने पिता का विधि-विधान से श्राद्ध तर्पण किया।
सौ पीढ़ियों को ब्रह्मलोक पहुँचाने वाला मुक्ति-धाम
धर्मग्रंथों के अनुसार, गण्डकी और लोहावती (लोहसरित्) नदियों के मध्य स्थित इस पावन क्षेत्र में जो भी भक्त स्नान कर शांत स्वरूप शिव की आराधना करते हैं, उन्हें परम गति प्राप्त होती है। यहाँ पितरों का श्राद्ध व पिंडदान करने से कुल के समस्त पितृ तृप्त हो जाते हैं:
पिण्डदानं प्रकुर्वन्ति ते यत्र मुनिसत्तमाः। कुलानि ते ब्रह्मभुवं प्रापयन्ति शतानि वै ॥ गण्डकी-लोहसरितोर्मध्ये वै द्विजसत्तमाः। निमज्ज्य ये शिवं शान्तं ते यान्ति परमां गतिम् ॥
अर्थ: हे मुनिश्रेष्ठों! इस तीर्थ पर जो मनुष्य अपने पितरों का पिंडदान करते हैं, वे अपने सैकड़ों कुलों को ब्रह्मलोक की प्राप्ति करा देते हैं। गण्डकी और लोहावती नदी के मध्य स्नान करके शिव की पूजा करने वाले जीव परम गति को प्राप्त होते हैं। यही नहीं, माता हिडिम्बा और वीर घटोत्कच को प्रणाम कर जो मानसेश्वर की अर्चना करते हैं, वे समस्त सुख भोगकर अंत में शिवसायुज्य प्राप्त करते हैं।
राजा निर्भय चंद और गुप्त नौले का चमत्कार
ऐतिहासिक साक्ष्यों के अनुसार, आठवीं शताब्दी में कूर्मांचल के प्रतापी राजा निर्भय चंद ने भगवान मानेश्वर के प्रति अपनी अगाध आस्था व्यक्त करते हुए यहाँ भव्य मंदिर का निर्माण कराया था। मंदिर परिसर में कई सिद्ध संतों की प्राचीन समाधियाँ भी विद्यमान हैं। निकट ही माँ पूर्णागिरि का प्राचीन मंदिर भी स्थित है।
मंदिर परिसर में स्थित ‘गुप्त नौला’ श्रद्धालुओं के बीच विशेष कौतूहल और श्रद्धा का केंद्र है। लोकमान्यता है कि इस दिव्य नौले का जल ग्रहण करने और स्नान करने से दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों का शमन हो जाता है। प्रकृति, इतिहास और आध्यात्मिकता के संगम वाले इस रहस्यमयी धाम का दर्शन मात्र ही मानव जीवन को कृतार्थ कर देता है।
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