मायके की देहरी पर जब उतरीं माँ गौरा: सात अनाजों के गूढ़ विधान और लोकगीतों की मधुर तान में क्यों सराबोर हुआ लालकुआं?

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लालकुआं
पहाड़ों की गोद से बहती लोकसंस्कृति की वह कौन सी पावन धारा है, जो हर वर्ष महिलाओं को अटूट श्रद्धा और आत्मीयता के अनूठे बंधन में बांध देती है? यह आस्था का वही गहरा रहस्य और उल्लास है, जो लोकपर्व ‘सातो-आठो’ के आगमन के साथ लालकुआं के कण-कण में घुल गया। मायके आतीं मां गौरा के स्वागत और पारंपरिक आस्था के संगम ने पूरे क्षेत्र को भक्तिमय रस से सराबोर कर दिया।
पंचमी के संकल्प से फलाहारी मंदिर के पावन तट तक
पर्व का शुभारंभ पंचमी तिथि पर पूर्ण निष्ठा के साथ हुआ, जहां सुहागिन महिलाओं ने नियमपूर्वक सात प्रकार के अनाजों (बिरूड़) को भिगोकर रखा। इसके बाद ब्रह्ममुहूर्त में श्रद्धालु महिलाएं फलाहारी मंदिर पहुंचीं। वहां पूर्ण विधि-विधान और पवित्रता के साथ इन अनाजों को धोकर पूजा-अर्चना की प्राचीन परंपरा को आगे बढ़ाया गया।
वैदिक मंत्रोच्चार और देव प्रतिमाओं की प्राण-प्रतिष्ठा
मंदिर की रस्मों के बाद नगर पंचायत सभासद दीप्ति पांडे के निवास पर गौरा और महेश्वर की मनोहारी प्रतिमाएं तैयार की गईं। पुरोहित पंडित भास्कर पाठक द्वारा उच्चारित वैदिक मंत्रों की गूंज के बीच पूजा-अर्चना संपन्न हुई। उपस्थित महिलाओं ने श्रद्धाभाव से गौरा-महेश्वर का पूजन कर अपने परिवार की सुख-शांति, समृद्धि और अखंड सौभाग्य का वरदान मांगा।
पर्व की गूढ़ महत्ता: प्रकृति, परिवार और मायके का अमर स्नेह
उत्तराखंड की लोकपरंपरा में सातो-आठो केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि प्रकृति और भावनाओं का अद्भुत संगम है:
* गौरा-महेश्वर का मिलन: यह पर्व मां गौरा के मायके आने की असीम खुशी और भगवान शिव द्वारा उन्हें विदा कराने की भावुक गाथा का सजीव चित्रण है।
* सप्तधान्य (बिरूड़) का आशीष: सात अनाजों का यह पवित्र पूजन घर-परिवार में अन्न-धन की संपन्नता, कृषि समृद्धि और वंश वृद्धि का प्रतीक माना जाता है।
* संस्कृति की अखंड धारा: यह पर्व आपसी प्रेम, सामाजिक सौहार्द और नई पीढ़ी को अपनी समृद्ध जड़ों से जोड़े रखने का संदेश देता है।
मांगलिक गीतों और लोकनृत्यों पर झूमी मातृशक्ति
पूजन के उपरांत महिलाओं ने पारंपरिक मांगलिक गीतों की मधुर तान छेड़ी और लोकनृत्यों की सुंदर प्रस्तुति देकर माहौल को आनंदमय बना दिया। महिलाओं ने एक-दूसरे को पर्व की बधाई देते हुए देवभूमि की अनमोल लोकसंस्कृति को जीवंत रखने का संकल्प दोहराया।
इस पावन अवसर पर सभासद दीप्ति पांडे, गीता भट्ट, बबली भट्ट, नीमा पाण्डे, उमा मेर, रजनी, गीता मेहरा, शोभा जोशी, चन्द्रा कौर, दीपा पाण्डे, मीरा बोरा और रेखा यादव सहित भारी संख्या में मातृशक्ति मौजूद रही।

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