जयपुर खीमा की वादियों में अचानक क्यों छा गया असीम सन्नाटा… जानिए किस ममतामयी पुण्यात्मा की विदाई से सहम उठे हजारों दिल!

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मोटाहल्दू / जयपुर खीमा:
कहते हैं कि जब घर से माँ का आंचल उठ जाता है, तो मानो सिर से आसरा ही गायब हो जाता है। माँ केवल एक रिश्ता नहीं, बल्कि वात्सल्य, त्याग और संस्कारों की वह पावन मूरत होती है, जिसकी मौजूदगी मात्र से जीवन के सारे दुख-दर्द दूर हो जाते हैं। जयपुर खीमा मोटाहल्दू की हवाओं में आजकल ऐसा ही एक अमिट सन्नाटा और गहरी उदासी घुली हुई है, जिसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है। मूल रूप से असगोली द्वारहाट की निवासी एवं वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र अधिकारी की पूजनीय माताजी श्रीमती रुक्मणी देवी (78 वर्ष) गत 20 जुलाई को अपने नश्वर शरीर को त्यागकर परमधाम प्रस्थान कर गईं।
शास्त्रों में भी माता के स्थान को समस्त संसार से ऊँचा और वंदनीय माना गया है—
माता गुरुतरा भूमेः खात् पितोच्चतरस्तथा।
मनो शीघ्रतरं वातात् चिन्ता बहु तरी तृणात्॥
अर्थात, माता इस भूमि से भी अधिक भारी और महान है तथा पिता आकाश से भी ऊँचे हैं। स्वर्गीय रुक्मणी देवी का पूरा जीवन इसी महावाक्य का जीवंत प्रमाण था। वे आध्यात्मिक विचारधारा की धनी और अपनी समृद्ध लोक-संस्कृति से अटूट लगाव रखने वाली अत्यंत धर्मनिष्ठ महिला थीं। सिद्धपीठ महादेव विभाण्डेश्वर के पावन चरणों में उनकी अनन्य और अडिग श्रद्धा थी। लगभग ढाई वर्ष पूर्व उनके पति स्व० श्री प्रेम सिंह अधिकारी का निधन हो गया था, जो स्वयं एक आदर्श पुरुष थे, अपनी जन्मभूमि असगोली से जिनका गहरा स्नेहमय नाता था और जिनका जीवन विराट संघर्षों की एक अद्भुत गाथा था।
पति के साए से वंचित होने के बाद, विगत डेढ़ वर्ष से वे अपने पुत्र वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र सिंह अधिकारी के साथ जयपुर खीमा मोटाहल्दू में निवासरत थीं। यहाँ के जनमानस में भी उनके प्रति अपार श्रद्धा और सम्मान था। वे न केवल अपने परिवार बल्कि क्षेत्र के गरीब, बेसहारा और असहाय लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहती थीं। उनके दुलार भरी बातें और ममतामयी मुस्कान आज भी क्षेत्रवासियों की स्मृतियों में तरोताजा हैं। वे अपने पीछे दो पुत्रों—वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र अधिकारी व राहुल अधिकारी—तथा दो पुत्रियों का हँसता-खेलता, संस्कारों से परिपूर्ण भरा-पूरा परिवार छोड़ गई हैं। पूरे परिवार में उनके रोपे हुए उच्च धार्मिक व नैतिक संस्कारों की झलक स्पष्ट दिखाई देती है।
भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने आत्मा की अमरता और जीवन के इस शाश्वत सत्य को उजागर करते हुए कहा है—
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा न्यान्यानि संयाति नवानि देही॥
अर्थात, जिस प्रकार मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, ठीक उसी प्रकार आत्मा जीर्ण-शीर्ण शरीर को छोड़कर नए स्वरूप को प्राप्त करती है। आगामी 31 जुलाई को उनके जयपुर खीमा स्थित आवास पर ‘पीपलपानी’ संस्कार सम्पन्न होगा, जहाँ क्षेत्र के लोग एकत्र होकर उन्हें अपनी भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करेंगे।
उनकी इस विदाई से समूचे क्षेत्र में शोक की गहरी लहर व्याप्त है। क्षेत्र के तमाम राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक संगठनों एवं आध्यात्मिक विभूतियों व पत्रकारों ने उनके देहावसान पर गहरा शोक व्यक्त करते हुए दिवंगत आत्मा की शांति की प्रार्थना की है। ईश्वर से यही याचना है कि वे इस पुण्यात्मा को महादेव विभाण्डेश्वर के श्रीचरणों में परम स्थान दें और शोकाकुल अधिकारी परिवार को इस असीम दुख को सहने की शक्ति प्रदान करें।
॥ ॐ शांति शांति शांति ॥