हल्द्वानी के शिवधाम में ऐसा क्या हुआ जिसने जगाई प्राचीन वैदिक चेतना? जानिए देववाणी के उस महामंथन का रहस्य

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ल्द्वानी (नैनीताल)। आधुनिकता की चकाचौंध के बीच हल्द्वानी के छड़ायल सुयाल स्थित श्रीशिव धाम मंदिर में एक ऐसा अलौकिक दृश्य देखने को मिला, जिसने उपस्थित जनसमूह को सीधे वैदिक काल की समृद्ध परंपराओं से जोड़ दिया। श्री गिरिजा देवी सनातन सेवा समिति द्वारा आयोजित इस विशेष समागम में विधि-विधान, मंत्रोच्चार और देववाणी के गहन चिंतन का ऐसा संगम हुआ कि हर कोई अभिभूत रह गया। अवसर था श्रावणी उपाकर्म एवं संस्कृत दिवस समारोह के भव्य आयोजन का।

वैदिक मंत्रोच्चार से गूंज उठा शिवालय कार्यक्रम का संचालन प्रो. डॉ. एस. डी. तिवारी के कुशल निर्देशन और डॉ. नवीन चन्द्र जोशी के वैदिक पौरोहित्य में संपन्न हुआ। प्रातःकाल सर्वप्रथम विघ्नहर्ता श्रीगणेश और पंचांग पूजन के साथ कलश में सप्तऋषियों की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। इसके उपरांत रक्षा विधान, वेदोक्त ऋषियों का तर्पण एवं वंशोक्त ऋषियों का विधिपूर्वक पूजन संपन्न हुआ। श्रद्धालुओं ने संकल्पबद्ध होकर नया यज्ञोपवीत (जनेऊ) धारण किया और रक्षाबंधन की प्राचीन वैदिक परंपरा का निर्वहन किया।

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इस पावन अनुष्ठान में आचार्य गोविन्द बल्लभ जोशी, मंजीत सति, संजय शास्त्री, विनोद चन्द्र, चन्द्र शेखर भट्ट, भावेश जोशी, रितेश जोशी और योगेश सहित अनेक सनातन प्रेमियों ने सहभागिता की।

संस्कृत गोष्ठी: मानवता निर्माण की कुंजी है देवभाषा धार्मिक अनुष्ठान के पश्चात आयोजित संस्कृत गोष्ठी में विद्वानों ने भाषा के गूढ़ रहस्यों पर मंथन किया। मुख्य वक्ता डॉ. नवीन चन्द्र जोशी ने कहा कि सृष्टि के आदि से ही संस्कृत देवभाषा रही है और यह विश्व की समस्त भाषाओं की जननी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि आधुनिक विज्ञान से लेकर आत्मज्ञान तक का समस्त भंडार इसी भाषा में समाहित है।

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कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्रो. डॉ. एस. डी. तिवारी ने कहा कि हमारे समस्त वेद और पुराण इसी दिव्य भाषा में रचित हैं। संस्कृत केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि मनुष्य को संस्कारवान बनाकर मानवता का निर्माण करने की सक्षम शक्ति है।

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विशिष्ट प्रतिभा का सम्मान समारोह के समापन पर सामाजिक क्षेत्र तथा संस्कृत एवं संस्कृति के संवर्धन में अविस्मरणीय योगदान देने वाले प्रसिद्ध शिक्षाविद् चन्द्र शेखर भट्ट को विशेष रूप से सम्मानित किया गया। समिति के संरक्षक प्रो. डॉ. एस. डी. तिवारी और आयोजक मंडल ने उन्हें माल्यार्पण कर एवं अंगवस्त्र भेंट कर उनका अभिनंदन किया। सम्मान से अभिभूत श्री भट्ट ने आह्वान किया कि संस्कृत को जन-जन की भाषा बनाने के लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को संगठित प्रयास करने होंगे।

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